Thursday, September 19, 2024

Shalok/ श्लोक

श्लोक-
किं कवेस्तेन काव्येन किं काण्डेन धनुष्मतः।
परस्य हृदये लग्नं न घूर्णयति यच्छिरः।।
त्रिविक्रमभट्ट कृत नलचम्पू (1/5)

अर्थ- उस कवि के काव्य और उस धनुर्धर के बाण का क्या लाभ, जो श्रोता/शत्रु के हृदय को छूकर उसके शिर को हिला/चकरा न दें।

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