श्लोक-
किं कवेस्तेन काव्येन किं काण्डेन धनुष्मतः।परस्य हृदये लग्नं न घूर्णयति यच्छिरः।।
त्रिविक्रमभट्ट कृत नलचम्पू (1/5)
अर्थ- उस कवि के काव्य और उस धनुर्धर के बाण का क्या लाभ, जो श्रोता/शत्रु के हृदय को छूकर उसके शिर को हिला/चकरा न दें।
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