शिर्गुल/श्रीकुल महाराज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि-
🙏ॐ शिर्गुलाय नमः🙏
यह सुलतानों के शासन काल की 13वीं सदी की बात है, उन दिनों दिल्ली में तुर्कों का शासन था, जिन्हें दास वंश के शासक भी कहा जाता था। उनका शासन 1206-1290 ई. तक चला। जनश्रुति के अुनसार जिसमें तुर्कों के साथ युद्ध का वर्णन आता है और देवताओं की पूजा में भी यह तथ्य विद्यमान है। इससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि शिर्गुल देव तथा उनके भाई बहनों का अवतार तुर्की सल्तनत (1206-1210 ई.) के शासन काल में इन महान आत्माओं ने अवतार लिया था। जिला सिरमौर की राजगढ़ तहसील मे राजगढ़-हाब्बन रोड पर 18 कि.मी. की दूरी पर स्थित शाया नामक गांव स्थित है। वहां पर श्री भुकडू राजा राज्य करते थे, जो कि सन्तान न होने से दुखी थे। उन्होंने सन्तान की प्राप्ति के कई उपाय किए परन्तु कोई लाभ प्राप्त नहीं हुआ। फिर उन्हें मालुम हुआ कि कशमीर के देश नाथ कौल उर्फ देशु पण्डित बहुत विद्वान पंडित है। वह सन्तान न होने के प्रति अवगत एवं उपाय कर सकते है। इसी चिन्ता को लेकर भुकडू महाराज ने कशमीर की राह ली।
कशमीर जो कि यहां से अनुमानित 700 कि.मी. का पैदल तथा उबड़-खाबड़ उत्तराई व चढ़ाई वाला अति दूर्गम सफर, तय करके कुछ ही दिनों में कशमीर पहुंच गए। पण्डित जी को सोने की बजीऊरी (सीताफल के आकार की) भेंट की और सजल नयनों से अपनी दास्तान सुनाई। पण्डित जी शिव उपासक, तांत्रिक तथा ज्योतिषि विद्या के ज्ञाता थे। उन्होंने भुकडू महाराज को घर का दोष, खोट बताया और उपाय भी। उन्होंने कुल बदलने की बात भी कही कि आपको ब्राह्मण कुल की कन्या से शादी करनी होगी। पण्डित जी ने भुकडू महाराज के प्रति हवन यज्ञ कर, हवन की राख तथा मेवा मन्त्रित कर महाराज को दिया और कहा कि अपनी दोनों रानियों को खिलाना शायद पहली रानी के भी सन्तान हो जाए। जो सन्तान आपके घर में होगी व पूर्ण कलाओं से परिपूर्ण देव रूप होगी। चिंता के गहरे सागर में डूब श्री भुकडू महाराज ने घर की राह ली और कुछ दिनों पश्चात घर पहुंच गए। अति दुखी मन से उन्होंने अपनी प्रिय रानी दयमन्ती को सारी बातें बताई जो पण्डित जी ने भुकडू महाराज को बताई थी और दूसरी शादी की बात भी। रानी साहिबा ने कहा महाराज मुझे सौतन आने का दुख नहीं बल्कि खुशी होगी अगर आपके सन्तान हो जाती है।
रानी दमयन्ती पास ही के गांव मनौण पहुंची और सजल नयनों से अपनी दुख भरी दास्तान श्री लोज पण्डित को बताई और महाराज के लिए उनकी बहन दुदमा की मांग की। विवाह के पश्चात वह मेवा मिष्ठान जो कशमीर के पण्डित जी ने दिया था दोनों रानियों को खिलाया जिससे दोनों रानियां गर्भवती हो गई। दोनों ने पुत्रों को जन्म दिया, कुछ समय पश्चात दोनों पुत्रों का नामकरण किया गया, दुदमा के पुत्र का नाम कुल में जन्में पहले पुत्र होनें के कारण ‘‘श्रीकुल’’ रखा गया और रानी दमयन्ती जिसका प्रसव सरांह से आते समय सरांहटी नामक स्थान, जो शाया से 8 किलोमीटर है, अति पीड़ा के कारण दमयन्ती ने प्रभु की आराधना की और बिजली गिरने के धमाके से प्रसव हुआ था। इसलिए उसका नाम ‘‘बिजट’’ रखा गया। दोनों रानियों, (दुदमा के तीन, और दमयन्ती के दो), बच्चे हो गए। भुकडू महाराज खुशियों से झूम उठे। परन्तु विधाता को उनकी खुशी रास न आई।
कुछ ही समय पश्चात दोनों ही रानियां स्वर्ग सिधार गई और बच्चों को दु:ख और कष्ट के गहन सागर में डुबो गई। अब भुकडू महाराज के ऊपर चिन्ता का पहाड़ टूट पड़ा, बच्चे बिखर गए। दमयन्ती के बच्चों को उनके नाना, देवी सिंह उर्फ देवू ठाकुर सरांह ले गए और दुदमा के बच्चों को उनके मामा, लोज पण्डित अपने घर मनौण ले गए। लोज पण्डित की पत्नी, ब्राह्मणी स्वार्थी व क्रुर स्वभाव की थी। वह नहीं चाहती थी कि इन बच्चों को मनौण ले जाया जाए और उनकी देखभाल की जाए। उसने उन बच्चों को सताना आरम्भ कर दिया। वे बेचारे पशु के पास जाते और सत्तू व सूखी रोटी ही उन्हें दी जाती थी। यदि पशु भूखे रहते या जल्दी घर आ जाते तो उन्हें मार खानी पड़ती थी। उन्हें निकालने तथा जान से मारने के प्रयास भी किए गए परन्तु मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। उसके प्रयास विफल हुए।
अब बच्चे बड़े हो गए। घर का सारा कार्य उनसे लिया जाने लगा। फागू क्यार में 17-18 हाली हल लगाने हेतु बुलाए गए शिर्गुल भी उनके साथ उतना ही हल चला रहा था जितना शेष हाली। ब्राह्मणी अन्य को घी- सीड़ लाई और बच्चों को सत्तू के गोले जिसमें मक्खी आदि कीट सम्मिलत थे। सभी हाली उसे देख कर आश्चर्य चकित हो गए। परन्तु कोई भी उसे कहने का साहस नहीं कर सका। शिर्गुल ने कहा- मामी अगर सत्तू लाए थे तो हाथ धोने को पानी तो लाना था। ब्राह्मणी ने उत्तर दिया, ‘‘अगर तू इतना शुचा (पवित्र) है तो पानी यहीं पर पैदा क्यों नहीं करता?’’ शिर्गुल को अति मलाल हुआ और उसने क्रोध वश जमीन में लात मारी और पानी की धारा बहने लगी। बच्चे पशुओं को ताली, तीसरी की तरफ ले गए और सत्तू के गोले पत्थर में लेप दिए। उन पत्थरों में मक्खी आदि कीट के पंखो के निशान आज भी विद्यमान है। छोटे भाई चन्देश्वर को भूख सताने लगी अब उसको क्या खिलाएं! शिर्गुल को क्रोध आया और चन्देश्वर से कहा कि इन पशुओं को घर ले जाना और स्वंय अदृश्य हो गए। आसमान में काली घटा छा गई और अन्धेरा हो गया। चन्देश्वर पशु घर ले गया और ब्राह्मणी को पशु बांधने हेतु आवाज लगाई। ब्राह्मणी पशु बांधने आई, मधुमक्खी की भिनभिनाहट के साथ काली का वाहन आया, शिर्गुल की छोटी बहन को भी देवी शक्ति आई और उसमें सम्मिलित हो गई तथा अदृश्य हो गई। यह मक्खियां ब्राह्मणी को चिपक गई और ब्राह्मणी को यमपुरी भेज दिया। शावगा के ऊपर अति भंयकर ओलावृष्टि हुई और सारी फसलें नष्ट हो गई। जब शिर्गुल देव का क्रोध शांत हुआ तब आसमान से बादल हटने लगे और धूप निकल गई।
शिर्गुल देव मनौण में प्रकट हो गए उनकी छोटी बहन भी मानव काया में आकर प्रकट हो गई। यह चमत्कार देख कर लोग हैरान हो गए और यह समाचार नौ परगनों में हवा के झौंके की तरह फैल गया और लोग मनौण में एकत्रित हो गए। शिर्गुल आदि बच्चों को शाया ले जाया गया और राज तिलक किया गया। शिर्गुल महाराज शाया में रहे तथा चन्देश्वर और उनकी छोटी बहन जिसका नामकरण नहीं हुआ था, गाय के साथ रहने के कारण लोग उसे गराली के नाम से ही पुकारते थे। बाद में उसे गराई या गुड़ाली के नाम से ही पुकारा गया। चन्देश्वर के साथ मामे (लोज पण्डित) की देख भाल हेतु मनौण चले गए।
चूड़धार में चूडिय़ा दानव रहता था उसने भी आतंक मचा रखा था। पास की बस्ती में रहने वाले लोगों के पशु व आदमी को अपना शिकार बनाने लगा। लोगों में हाहाकार मच गया और शिर्गुल के पास अपनी चिन्ता प्रकट की। शिर्गुल देव सराँह आए और बिजट देव को चूडिय़ा दानव के आतंक से अवगत किया और चूड़धार के लिए प्रस्थान किया, चूडिय़ा दानव के साथ घमासान युद्ध हुआ। अन्तत: चूडिय़ा दानव चूड़धार से भाग ही रहा था कि श्री बिजट देव ने उसका रास्ता रोक दिया। चूडिय़ा दानव ने श्री बिजट देव पर वार किया और वे वहीं पर मुर्छित हो कर गिर पड़े। जब शिर्गुल देव ने श्री बिजट देव को मुर्छावस्ता में देखा तो अति दु:ख के कारण अचेत हो गए। लोगों में हाहाकार मच गया, कुछ समय पश्चात दोनों भ्राता जाग उठे और बिजट देव को भी शक्ति आ गई और देव रूप हो गए। शिर्गुल महाराज ने धरती से एक चुटकी मिट्टी उठाई और आसमान की और फैंकी आसमान को मेघराज ने घेर दिया, शिर्गुल महाराज ने फिर एक चुटकी मिट्टी उठाई कि मेेघराज ने बज्र छोड़ा और चूडिय़ा दानव के पिछे भागता हुआ उसको धराशाई कर दिया।
इस प्रकार शिरगुल महाराज की ख्याति निरन्तर बढऩे लगी। यदि किसी को शिव रचित सृष्टि अर्थात भूत-प्रेत, पिशाच आदि का कोप हो तो शिर्गुल महाराज उन्हें उससे मुक्त कर देते थे। सभी परगनों तथा दूर-दराज के क्षेत्रों तक शिर्गुल देव की प्रसिद्धि तथा गुणगान होने लगा। यह समाचार दिल्ली दरबार तक पहुंच गया जैसा कि आरम्भ में बताया गया कि दिल्ली में तुर्की शासन था तथा गुप्तचरों द्वारा उन्हें सूचना मिली की शिर्गुल नाम के व्यक्ति में देवीय शक्ति का संचार हुआ है। दिल्ली सरकार ने उन्हें विशेष बैठक हेतु दिल्ली बुलाया। शिर्गुल देव, चन्देश्वर और 30-40 लोग उनके साथ हाट हेतु दिल्ली के लिए चल पड़े। जब दिल्ली पहुंचे तो गुप्तचरों ने उनके आगमन की सूचना दिल्ली सल्तनत को दे दी। तुर्की शासकों ने उनकी परीक्षा लेने के लिए जमना के किनारे गाय को हलाल करने हेतु एक बुचड़ को भेजा और गुप्तचर भी साथ भेजे।
शिर्गुल देव का काफिला जमना के किनारे पहुंचा, तो उसी समय वह कसाई गाय को हलाल करने के लिए उल्टा वार करने लगा। वह वार गाय को न लगकर उसकी गर्दन में लगा और सिर धड़ से अलग होकर शिर्गुल महाराज के चरणों के पास आ गया। एक अन्य घटना में बनिये का नुकसान होना आदि अन्य भी कई चमत्कार हुए। गुप्तचरों ने सारी घटनाओं की सूचना दिल्ली सल्तनत को दे दी। दिल्ली सरकार ने अपने सिपाहियों को उन्हें चमड़े की बेड़ियों में बांध कर विशेष जेल में बंदी बनाने के आदेश दिए। सिपाहियों ने उन्हें चमड़े की बेड़ियों में बांध कर जेल में डाल दिया। उसी जेल में श्री डूम देव, श्री महासू, बागड़ के गुग्गा चौहान आदि थे। उनको भी चमड़े की बेड़ियाँ डाली हुई थी। शिर्गुल महाराज ने उन्हें अपना परिचय दिया उन्होनें भी अपनी व्यथा सुनाई और विचार विमर्श किया कि किस प्रकार जेल से निकला जाए।
शिर्गुल देव की दृष्टि झाड़ू मार रही जमादारनी पर पड़ी और उसको खिड़की के पास बुलाया और कहा कि बहन कोई पैना नश्तर लाकर दें। प्रात: जब वह झाड़ू देने जेल के पास आई तो उसने वह नश्तर(छूरा) खिडक़ी के रास्ते अन्दर डाला और स्वयं अपने काम पर व्यस्त हो गई। शिर्गुल देव ने अन्य बंदियों से कहा कि हम में से कोई बेड़ियाँ काटने का प्रयास करें तो वह शक्ति हीन नहीं होगा, बल्कि वह हमसे भी अधिक शक्तिवान होगा एवं उसकी मान्यता सर्वत्र होगी। गुग्गा पीर ने मुंह में चाकू लेकर शिर्गुल महाराज की बेड़ियाँ काट दी। इस प्रकार सभी केदियों की बेड़ियाँ काटकर सभी जेल से मुक्त हो गए। जब वह उत्तर दिशा के खाली मैदान में पीपल के पास पहुंचे तो तुर्कों ने हमला कर दिया। शिर्गुल महाराज ने धरती से धूल उठाई और उनकी तरफ फैंक दी। सिपाहियों को आपस में ही एक-दूसरे को कैदी दिखने लगे और वे आपस में एक-दूसरे को मारने लगे। इस प्रकार तुर्कों के काफी सिपाही मारे गए। जब तुर्को को पता लगा कि हमारी सेना के बहुत से सिपाही मारे गए है और उनका बाल भी बाका नहीं हुआ। फिर तो तुर्की शासक भयभीत हो गए और क्षमा याचना करने लगे, जिसे शिर्गुल महाराज ने स्वीकार किया।
उसी समय चूड़धार से चूहडू ने गोहड़ी (छोटा पत्थर), भेजी जो पीपल में लगी। शिर्गुल महाराज ने उसे उठाया और कहने लगे कि हमारे वीर योद्धा चुहडु पर आफत आई है हमें शीघ्र वापस जाना चाहिए। तुर्कों ने उन्हें घोड़े भेंट किए। शिर्गुल देव को सांवली घोड़ी भेंट की। वापस आने ही लगे थे कि भंगायण भी सामने आ गई और विनती करने लगी की भईया मैं आपके साथ चलूंगी। शिर्गुल देव ने धरती से मिट्टी उठाई और उसकी तरफ उड़ा दी। फिर तो उसमें भी देवीय शक्ति आ गई और उनके आगे जाने लगी। जो भी जीव उसकी राह में आने लगा वह स्वर्ग लोक को चला गया। जब शिर्गुल देव ने ऐसा कोप देखा तो उसकी शक्ति छीन ली। फिर तो वह क्षमा याचना करने लगी। शिर्गुल महाराज ने कहा कि बहन यदि तुमने इस तरह की हरकत की तो हमारे पहाड़ी इलाके में तो गिनी चुनी आबादी भी शेष नहीं बचेगी। भंगायण माता ने वचन दिया- भईया मैं आपकी आज्ञा के बिना किसी को नहीं सताऊंगी, हाँ यदि मुझे किसी के लिए पुकारोगे तो अवश्य आऊंगी। शिर्गुल देव ने कहा बहन! उस घर के लोगों को सचेत करोगी, यदि वह तुम्हारा उपाय करती है तो उसके घर को छोड़ना पड़ेगा। भंगायण ने हाथ जोड़ कर कहा भईया मैं ऐसा ही करूंगी।
शिर्गुल देव का काफिला शाया पहुंचा। लोगों ने उनका स्वागत किया और चूड़धार पर आक्रमण की योजना बनाई। चन्देवश्वर का काफिला मैहरोग होते हुए चूड़धार पहुंचा और शिर्गुल महाराज सराँह होकर चूड़धार पहुंचे और बिजट महाराज को भी साथ लाए जब काला बाग पहुंचे और चुहडु को चोखट दानव के साथ मुकाबला करते देखा तो धरती माँ की धूल उठाई और उसकी और फैंक दी कि चुहडु का परिवार शिला में परिवर्तित हो गया। शिर्गुल महाराज का काफिला आगे बढ़ा और जब चढ़ाई वाली तंग मार्ग में पहुंचे तो शिर्गुल देव ने तुर्कों द्वारा भेंट की गई सांवली घोड़ी को शिला में परिवर्तित कर दिया। आज भी लोग उसकी पूजा अर्चना करते हैं। चूड़धार में चौखट दानव के साथ घमासान युद्ध हुआ। अन्तत: वह चौखट की ओर भाग ही रहा था कि शिर्गुल देव ने शिलाओं के मध्य तंग मार्ग में उसे पकड़ लिया और खड़ग का ऐसा प्रहार किया कि उसका सिर धड़ से अलग हो गया और खड़ग जा कर शिला में लगा जिससे शिला में भी निशान पड़ गया, आज भी वह निशान विद्यमान है। चौखट दानव का सिर तो वहां पड़ा परन्तु धड़ अदृश्य हो गया जो छाजपुर जा कर गिरा। आज भी वह विनशिरा के नाम से विख्यात है और छाजपुर के एक पेड़ में स्थित है। चूड़धार भय मुक्त हो गया और लोगों ने चूड़ चान्दनी को तीर्थ के रूप में मानने का आग्रह किया परन्तु वहां पानी का अभाव था। शिर्गुल देव ने मानसरोवर से पानी ला कर चूड़ चान्दनी को तीर्थ बना कर लोगों का कल्याण किया। इस प्रकार अपने दायित्व को निभाकर महाराज सदेह परमधाम चले गए। श्री बिजट देव, श्री चन्देश्वर देव, गुड़ाई, बिजाई, भंगायण आदि सभी सदेह लोप हो गए और सबने अपने-अपने स्थान को ग्रहण किया।
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🙏ॐ शिर्गुलाय नमः🙏
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