माँ ....
ए इंसान मत भूल, जो किये उपकार उसने तुझ पर,
खुद हमेशा गीले में सोकर, तुझे सुलाया है सूखे पर।
खुद भूखा रहकर तुझे सदा ही भरपेट है खिलाया,
पर क्या कभी उसने इस उपकार को याद दिलाया?
सदैव डालकर परदा वो अपने दुःखों पर,
नहीं आने देती आँच कभी संतान के सुखों पर।
ममता के आँचल में मिलता है वो सुख,
जिससे भूल जाता हूँ संसार के सब दुःख।
जिसके सिर से माता का साया है उठ जाता,
उसके सुखों का सूरज फिर है छिप जाता।
कुपुत्र हुए पैदा इस धरा पर अनेक,
हुई नहीं कुमाता कोई भी एक।
जिसने किया जीवन में माँ का अनादर
नहीं मिला उसे कभी समाज में आदर।
जब भी जीवन के महान उपकारों को याद 'मनुज' करेगा,
तेरे उपकार के बाद ही बाकी उपकारों को रखेगा।
जीवन के सभी ऋणों से बेशक हो जाऊँ मुक्त मैं,
पर माँ इतना नहीं सामर्थ्य मुझमें कि तेरे ऋण से हो पाऊँ कभी उऋण मैं।
डॉ. मनोज शर्मा 'मनुज'
खुद हमेशा गीले में सोकर, तुझे सुलाया है सूखे पर।
खुद भूखा रहकर तुझे सदा ही भरपेट है खिलाया,
पर क्या कभी उसने इस उपकार को याद दिलाया?
सदैव डालकर परदा वो अपने दुःखों पर,
नहीं आने देती आँच कभी संतान के सुखों पर।
ममता के आँचल में मिलता है वो सुख,
जिससे भूल जाता हूँ संसार के सब दुःख।
जिसके सिर से माता का साया है उठ जाता,
उसके सुखों का सूरज फिर है छिप जाता।
कुपुत्र हुए पैदा इस धरा पर अनेक,
हुई नहीं कुमाता कोई भी एक।
जिसने किया जीवन में माँ का अनादर
नहीं मिला उसे कभी समाज में आदर।
जब भी जीवन के महान उपकारों को याद 'मनुज' करेगा,
तेरे उपकार के बाद ही बाकी उपकारों को रखेगा।
जीवन के सभी ऋणों से बेशक हो जाऊँ मुक्त मैं,
पर माँ इतना नहीं सामर्थ्य मुझमें कि तेरे ऋण से हो पाऊँ कभी उऋण मैं।
डॉ. मनोज शर्मा 'मनुज'
