Showing posts with label महाभारत. Show all posts
Showing posts with label महाभारत. Show all posts

Tuesday, October 29, 2024

महाभारत, संस्कृत, गीता, सनातन धर्म



Sanskrit-
पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर 2. भीम 3. अर्जुन
4. नकुल। 5. सहदेव

( इन पांचों के अलावा , महाबली कर्ण भी कुंती के ही पुत्र थे , परन्तु उनकी गिनती पांडवों में नहीं की जाती है )

यहाँ ध्यान रखें कि… पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन
की माता कुन्ती थीं ……तथा , नकुल और सहदेव की माता माद्री थी ।

वहीँ …. धृतराष्ट्र और गांधारी के सौ पुत्र…..
कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन 2. दुःशासन 3. दुःसह
4. दुःशल 5. जलसंघ 6. सम
7. सह 8. विंद 9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष 11. सुबाहु। 12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण। 14. दुर्मुख 15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण 17. शल 18. सत्वान
19. सुलोचन 20. चित्र 21. उपचित्र
22. चित्राक्ष 23. चारुचित्र 24. शरासन
25. दुर्मद। 26. दुर्विगाह 27. विवित्सु
28. विकटानन्द 29. ऊर्णनाभ 30. सुनाभ
31. नन्द। 32. उपनन्द 33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा 35. सुवर्मा 36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु 38. महाबाहु 39. चित्रांग 40. चित्रकुण्डल41. भीमवेग 42. भीमबल
43. बालाकि 44. बलवर्धन 45. उग्रायुध
46. सुषेण 47. कुण्डधर 48. महोदर
49. चित्रायुध 50. निषंगी 51. पाशी
52. वृन्दारक 53. दृढ़वर्मा 54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति 56. अनूदर 57. दढ़संघ 58. जरासंघ 59. सत्यसंघ 60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा 62. उग्रसेन 63. सेनानी
64. दुष्पराजय 65. अपराजित 
66. कुण्डशायी 67. विशालाक्ष
68. दुराधर 69. दृढ़हस्त 70. सुहस्त
71. वातवेग 72. सुवर्च 73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी 75. नागदत्त 76. उग्रशायी
77. कवचि 78. क्रथन। 79. कुण्डी 
80. भीमविक्र 81. धनुर्धर 82. वीरबाहु
83. अलोलुप 84. अभय 85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय 87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी। 89. विरवि
90. चित्रकुण्डल 91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि 93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान 95. दीर्घबाहु
96. सुजात। 97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी 99. विरज
100. युयुत्सु

( इन 100 भाइयों के अलावा कौरवों की एक बहनभी थी… जिसका नाम""दुशाला""था,
जिसका विवाह"जयद्रथ"सेहुआ था )

"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में-

ॐ . किसको किसने सुनाई?
उ.- श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई। 

ॐ . कब सुनाई?
उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।

ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।

ॐ. कोनसी तिथि को?
उ.- एकादशी 

ॐ. कहा सुनाई?
उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।

ॐ. कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में

ॐ. क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।

ॐ. कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय

ॐ. कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक

ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है। 

ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा 
और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने

ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?
उ.- भगवान सूर्यदेव को

ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में

ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।

ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद

ॐ. गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना

ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85 
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.

अपनी युवा-पीढ़ी को गीता जी के बारे में जानकारी पहुचाने हेतु इसे ज्यादा से ज्यादा शेअर करे। धन्यवाद

अधूरा ज्ञान खतरना होता है।

33 करोड नहीँ 33 कोटी देवी देवता हैँ हिँदू
धर्म मेँ।

कोटि = प्रकार। 
देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है,

कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं...

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मे :-

12 प्रकार हैँ
आदित्य , धाता, मित, आर्यमा,
शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष,
सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हे :-
वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार है :- 
रुद्र: ,हर,बहुरुप, त्रयँबक,
अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी,
रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँ
दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल :- 12+8+11+2=33 कोटी 

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है
तो इस जानकारी को अधिक से अधिक
लोगो तक पहुचाएं। ।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
📜😇 दो पक्ष-

कृष्ण पक्ष , 
शुक्ल पक्ष !

📜😇 तीन ऋण -

देव ऋण , 
पितृ ऋण , 
ऋषि ऋण !

📜😇 चार युग -

सतयुग , 
त्रेतायुग ,
द्वापरयुग , 
कलियुग !

📜😇 चार धाम -

द्वारिका , 
बद्रीनाथ ,
जगन्नाथ पुरी , 
रामेश्वरम धाम !

📜😇 चारपीठ -

शारदा पीठ ( द्वारिका )
ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम ) 
गोवर्धन पीठ ( जगन्नाथपुरी ) , 
शृंगेरीपीठ !

📜😇 चार वेद-

ऋग्वेद , 
अथर्वेद , 
यजुर्वेद , 
सामवेद !

📜😇 चार आश्रम -

ब्रह्मचर्य , 
गृहस्थ , 
वानप्रस्थ , 
संन्यास !

📜😇 चार अंतःकरण -

मन , 
बुद्धि , 
चित्त , 
अहंकार !

📜😇 पञ्च गव्य -

गाय का घी , 
दूध , 
दही ,
गोमूत्र , 
गोबर !

📜😇 पञ्च देव -

गणेश , 
विष्णु , 
शिव , 
देवी ,
सूर्य !

📜😇 पंच तत्त्व -

पृथ्वी ,
जल , 
अग्नि , 
वायु , 
आकाश !

📜😇 छह दर्शन -

वैशेषिक , 
न्याय , 
सांख्य ,
योग , 
पूर्व मिसांसा , 
दक्षिण मिसांसा !

📜😇 सप्त ऋषि -

विश्वामित्र ,
जमदाग्नि ,
भरद्वाज , 
गौतम , 
अत्री , 
वशिष्ठ और कश्यप! 

📜😇 सप्त पुरी -

अयोध्या पुरी ,
मथुरा पुरी , 
माया पुरी ( हरिद्वार ) , 
काशी ,
कांची 
( शिन कांची - विष्णु कांची ) , 
अवंतिका और 
द्वारिका पुरी !

📜😊 आठ योग - 

यम , 
नियम , 
आसन ,
प्राणायाम , 
प्रत्याहार , 
धारणा , 
ध्यान एवं 
समािध !

📜😇 आठ लक्ष्मी -

आग्घ , 
विद्या , 
सौभाग्य ,
अमृत , 
काम , 
सत्य , 
भोग ,एवं 
योग लक्ष्मी !

📜😇 नव दुर्गा --

शैल पुत्री , 
ब्रह्मचारिणी ,
चंद्रघंटा , 
कुष्मांडा , 
स्कंदमाता , 
कात्यायिनी ,
कालरात्रि , 
महागौरी एवं 
सिद्धिदात्री !

📜😇 दस दिशाएं -

पूर्व , 
पश्चिम , 
उत्तर , 
दक्षिण ,
ईशान , 
नैऋत्य , 
वायव्य , 
अग्नि 
आकाश एवं 
पाताल !

📜😇 मुख्य ११ अवतार -

 मत्स्य , 
कच्छप , 
वराह ,
नरसिंह , 
वामन , 
परशुराम ,
श्री राम , 
कृष्ण , 
बलराम , 
बुद्ध , 
एवं कल्कि !

📜😇 बारह मास - 

चैत्र , 
वैशाख , 
ज्येष्ठ ,
अषाढ , 
श्रावण , 
भाद्रपद , 
अश्विन , 
कार्तिक ,
मार्गशीर्ष , 
पौष , 
माघ , 
फागुन !

📜😇 बारह राशी - 

मेष , 
वृषभ , 
मिथुन ,
कर्क , 
सिंह , 
कन्या , 
तुला , 
वृश्चिक , 
धनु , 
मकर , 
कुंभ , 
मीन!

📜😇 बारह ज्योतिर्लिंग - 

सोमनाथ ,
मल्लिकार्जुन ,
महाकाल , 
ओमकारेश्वर , 
बैजनाथ , 
रामेश्वरम ,
विश्वनाथ , 
त्र्यंबकेश्वर , 
केदारनाथ , 
घुष्नेश्वर ,
भीमाशंकर ,
नागेश्वर !

📜😇 पंद्रह तिथियाँ - 

प्रतिपदा ,
द्वितीय ,
तृतीय ,
चतुर्थी , 
पंचमी , 
षष्ठी , 
सप्तमी , 
अष्टमी , 
नवमी ,
दशमी , 
एकादशी , 
द्वादशी , 
त्रयोदशी , 
चतुर्दशी , 
पूर्णिमा , 
अमावास्या !

📜😇 स्मृतियां - 

मनु , 
विष्णु , 
अत्री , 
हारीत ,
याज्ञवल्क्य ,
उशना , 
अंगीरा , 
यम , 
आपस्तम्ब , 
सर्वत ,
कात्यायन , 
ब्रहस्पति , 
पराशर , 
व्यास , 
शांख्य ,
लिखित , 
दक्ष , 
शातातप , 
वशिष्ठ !

******************* ***

महाभारत, भीष्म पितामह

My Thought-  महाभारत, Mahabharat 

भीष्म पितामह-

भीष्म पितामह कुरू वंश एवं हस्तिनापुर नरेश शांतनु तथा उनकी प्रथम पत्नी माँ गंगा के पुत्र थे।
इनका नाम देवव्रत था। शांतनु ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में देवव्रत को हस्तिनापुर के युवराज पद पर नियुक्त किया था।
      शांतनु अपनी प्रेमिका/प्रियसी सत्यवती के वियोग की पीड़ा से अत्यधिक दुःखी था। पिता शांतनु की इस पीड़ा को दूर करने के लिए देवव्रत ने हस्तिनापुर के राज सिंहासन का त्याग कर आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करने एवं सदैव हस्तिनापुर का दास बनकर राज्य की रक्षा करने की भीष्म (भयंकर) प्रतिज्ञा ली। इसी भीष्म प्रतिज्ञा के कारण पिता शांतनु ने देवव्रत को भीष्म नाम दिया।
     पिता के लिए किये गये इस महान त्याग के कारण पिता शांतनु ने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया।

पितामह- पाण्डु एवं धृतराष्ट्र के पुत्रों के पितामह (दादा)होने के कारण पितामह कहलाए।
गंगापुत्र- गंगा के पुत्र होने के कारण।

भीष्म पितामह ज्ञानी तथा शूरवीर योद्धा थे। 23 दिन तक चले द्वंद्व युद्ध में भीष्म के गुरु परशुराम भी भीष्म को पराजित नहीं कर पाये थे।

......... @मनुज

महाभारत में धर्म, धर्म, संस्कृत

Sanskrit-
धर्म क्या है, धर्म से क्या तात्पर्य है? Dharm....

महाभारत में धर्म-
बड़े-बड़े मनीषी, विद्वान धर्म को समझने में असमर्थ है। कोई इसकी सटीक परिभाषा नहीं बता पाता।
किन्तु महाभारत में व्यास जी ने इसे साधारण तरीके से व्याख्यायित किया है।
स्वानुकूल कार्य, जो हमें अच्छा लगता है, जो हमारे हित में है, जो हमें रुचिकर है, जिससे हमें आनंद मिलता है। इसी प्रकार का व्यवहार दूसरों के साथ भी करना। अर्थात जो हमें स्वयं के लिये अच्छा लगता है, वही दूसरों के साथ भी करना और जो हमें स्वयं के लिये अच्छा नहीं लगता, वो दूसरों के साथ भी नहीं करना। यही धर्म है। इसके विपरीत कार्य करना अधर्म है।
जो हमें स्वयं के लिये ठीक नहीं लगता, वो दूसरों के साथ करना ही अधर्म है।

महाभारत, सनातन धर्म

My Thought- Mahabharat , Article 

महाभारत के तथ्य-
कुरु वंश पर वंशहीन होने का खतरा-

राजा शांतनु एवं उनकी प्रथम पत्नी गंगा के पुत्र देवव्रत थे, जो कालांतर में अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाए। राजा शांतनु और उनकी द्वितीय पत्नी सत्यवती के चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुए। अपनी प्रतिज्ञा एवं वचनानुसार भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उसे राजगद्दी पर बिठाया। किंतु कुछ समय पश्चात एक युद्ध में राजा चित्रांगद वीरगति को प्राप्त हो गये, जिसके उपरान्त उनके अनुज विचित्रवीर्य का राज्याभिषेक हुआ। विवाह उपरान्त कुछ समय पश्चात अस्वस्थता के कारण विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गयी। अब हस्तिनापुर वंशहीन हो गया। इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने के कारण सत्यवती अत्यधिक चिंतित हो गयी। इस स्थिति के निवारणार्थ सत्यवती ने अपने पुत्र व्यास ऋषि, जो विवाह से पूर्व पराशर ऋषि के तपोबल से सत्यवती से उत्पन्न हुए थे, उन्हें बुलाया और कहा कि तुम चित्रांगद और विचित्रवीर्य के ज्येष्ठ भ्राता हो। इसलिए अपने अनुजों के दायित्वों को पूर्ण करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम हस्तिनापुर के वंश को आगे बढ़ाने के लिए विचित्रवीर्य की पत्नियों अंबिका तथा अंबालिका, जिन्हें भीष्म ने स्वयंवर से विचित्रवीर्य के लिए जीत कर लाया था, उनसे पुत्र उत्पन्न करो। ऋषि व्यास ने माता की आज्ञा को स्वीकार कर लिया। 
       सत्यवती ने पहले अंबिका को व्यास के पास भेजा। ऋषि के तेज को देखकर डर से अंबिका की आंखें बंद हो गयी। ऋषि ने माता सत्यवती से आकर कहा कि अंबिका द्वारा नेत्र बंद करने के कारण उसका पुत्र नेत्रहीन होगा। नेत्रहीन पुत्र की प्राप्ति के विषय में चिंतित होकर सत्यवती ने द्वितीय पुत्र की प्राप्ति हेतु अंबालिका को व्यास के पास भेजा। वो भी ऋषि के तेज को देखकर डर गयी और उसके शरीर का रंग उतर गया, जिससे वह पीली पड़ गयी। व्यास ने सत्यवती से कहा कि इसका पुत्र अस्वस्थ रहेगा तथा पाण्डु रोग से ग्रस्त होगा। यह सुनकर सत्यवती की चिंता और बढ़ गयी। उसने एक और पुत्र की प्राप्ति हेतु अंबालिका को व्यास के पास पुनः जाने के लिए कहा। किंतु डर के कारण अंबालिका ने अपने स्थान पर अपनी दासी को भेज दिया। दासी ने विना किसी भय के ऋषि का सामना किया। 
         इस प्रकार अंबिका के नेत्र बंद होने के कारण उससे नेत्रहीन धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। अंबालिका का शरीर पीला पड़ने के कारण उससे पाण्डु रोग से ग्रस्त पाण्डु का जन्म हुआ तथा दासी से स्वस्थ एवं शास्त्र ज्ञान में पारंगत एक नीतिवान पुत्र विदुर का जन्म हुआ।
     युवावस्था को प्राप्त होने पर धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ। गांधारी ने 100 पुत्रों एवं एक पुत्री दु:शला को जन्म दिया। पाण्डु का विवाह कुंती एवं माद्री से हुआ। कुंती ने युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को जन्म दिया तथा माद्री ने नकुल और सहदेव को जन्म दिया। इस प्रकार हस्तिनापुर के वंश को गति प्रदान हुई।
........................................


●शांतनु और गंगा- देवव्रत (भीष्म पितामह)।
●शांतनु और सत्यवती- चित्रांगद और विचित्रवीर्य।
व्यास ऋषि द्वारा तपोबल से पुत्र प्राप्ति-
● अम्बिका - धृतराष्ट्र
● अम्बालिका- पाण्डु 
● दासी- विदुर 
..........
●धृतराष्ट्र और गांधारी- 100 पुत्र और एक पुत्री (दुःशाला)।
●पाण्डु और कुंती- युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन।
●पाण्डु और मादरी- नकुल और सहदेव।
...............................
डॉ. मनोज शर्मा 'मनुज'
...............................

महाभारत, Mahabharat, कर्ण, Karna

महाभारत, Mahabharat, कर्ण, Karna

कर्ण के नाम-

कर्ण, सूर्यपुत्र, कौन्तेय, राधेय, सूतपुत्र, दानवीर, अंगराज।

कर्ण- सूर्य देव ने जन्म होने के साथ ही अपने पुत्र को यह नाम दिया था।

सूर्यपुत्र- सूर्य का पुत्र होने के कारण। सूर्य ने कुन्ती को पुत्र के रूप में कर्ण दिया था।
कुन्ती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने कुन्ती को वरदान के रूप में एक दिव्य मंत्र देते हुए कहा था कि इस मंत्र के जाप से तुम जिस भी देवता का ध्यान/आह्वान करोगी, तुम्हे उस देवता के अंश से उसी देवता के समान तेजस्वी और बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा। कुन्ती ने मन्त्र का परीक्षण करने के लिए सूर्य देवता का ध्यान किया और सूर्य देव ने प्रकट होकर उसे कर्ण के रूप में पुत्र दिया। विवाह से पूर्व पुत्र प्राप्ति होने पर लोक-लाज के भय से कुन्ती ने कर्ण को नदी के जल में प्रवाहित कर दिया। यह बालक नदी में अधिरथ और राधा को प्राप्त हुआ, जिन्होंने इसका पालन-पोषण किया।

कौन्तेय- कुन्ती का पुत्र होने के कारण।

राधेय- पालन करने वाली माता राधा के कारण।

सूतपुत्र- सूत अर्थात रथ को चलाने वाला सारथी। कर्ण के पालनकर्ता पिता 'अधिरथ' सारथी थे, जो राधा के पति थे। अधिरथ (सूत)का पुत्र होने के कारण कर्ण को सूतपुत्र कहा गया।

दानवीर- दान मांगने पर कर्ण किसी को भी निराश नहीं करते थे। उनसे जो कुछ भी कोई मांगता था, वो सहर्ष दे देते थे। इसके लिए फिर चाहे उनके स्वयं के प्राण ही संकट में क्यों न पड़ जाय। इन्द्र द्वारा दान मांगने पर कर्ण ने अपने शरीर से कवच और कुण्डल काट कर दिये थे। इसी कारण कर्ण को दानवीर कहा जाता है।

अंगराज-  अंग देश/प्रदेश का राजा होने के कारण। जब सूतपुत्र कहकर कर्ण का अपमान हो रहा था तो उस समय दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित किया था। दुर्योधन के इसी उपकार के कारण कर्ण दुर्योधन का मित्र बनकर आजीवन उसके प्राणों की रक्षा का प्रण लेता है।
......................................
  Dr. MANOJ SHARMA                    ......................................   


संस्कृतम् Sanskrit

शङ्खे तैले तथा मांसे वैद्ये ज्योतिषिके द्विजे।  यात्रायां पथि निद्रायां महच्छब्दो न दीयते।। संस्कृत व्याकरण में 9 विशिष्ट शब्दों के आगे ...