धर्म क्या है, धर्म से क्या तात्पर्य है? Dharm....
महाभारत में धर्म-
बड़े-बड़े मनीषी, विद्वान धर्म को समझने में असमर्थ है। कोई इसकी सटीक परिभाषा नहीं बता पाता।
किन्तु महाभारत में व्यास जी ने इसे साधारण तरीके से व्याख्यायित किया है।
स्वानुकूल कार्य, जो हमें अच्छा लगता है, जो हमारे हित में है, जो हमें रुचिकर है, जिससे हमें आनंद मिलता है। इसी प्रकार का व्यवहार दूसरों के साथ भी करना। अर्थात जो हमें स्वयं के लिये अच्छा लगता है, वही दूसरों के साथ भी करना और जो हमें स्वयं के लिये अच्छा नहीं लगता, वो दूसरों के साथ भी नहीं करना। यही धर्म है। इसके विपरीत कार्य करना अधर्म है।
जो हमें स्वयं के लिये ठीक नहीं लगता, वो दूसरों के साथ करना ही अधर्म है।
No comments:
Post a Comment