Hello, I am Dr. Manoj Sharma. I love writing and reading. I always want to learn something new and aspire to do something different from others. I never like to copy anyone. I always try to invent my own.
Friday, September 24, 2021
Thursday, September 23, 2021
Tuesday, September 21, 2021
Monday, September 13, 2021
Saturday, September 4, 2021
Sunday, August 29, 2021
Letter for Mobile Tower Installation
Letter/ Application
सेवा में
श्रीमान प्रबंध संचालक जी,
रिलायंस जियो मुख्यालय,
शिमला, हिमाचल प्रदेश ।
विषय: कोटगा गाँव में मोबाइल नेटवर्क (सिग्नल) की समस्या के संदर्भ में।
मान्यवर,
आपको अवगत कराना चाहता हूँ कि हमारे गाँव कोटगा, पंचायत- पौक्का, जिला-सिरमौर, हिमाचल प्रदेश में नेटवर्क (सिग्नल) की बहुत समस्या है। हमारे गाँव की जनसंख्या लगभग 800 व्यक्ति है। गाँव के लोग गाँव से दूर इधर-उधर सिग्नल की खोज में जाते हैं, फिर भी ठीक से सिग्नल नहीं मिल पाता। जिससे बच्चों को पढ़ाई की समस्या आती है तथा गाँव के लोग क्षेत्र एवं देश-विदेश से संबंधित सभी सूचनाओं से वंचित रहते है। गाँव से बाहर जो लोग व्यवसाय अथवा शिक्षा के लिए गए हुए हैं, उनका अपने परिवार वालों से संपर्क नहीं हो पाता। स्वास्थ्य संबंधित समस्या आने पर स्वास्थ्य कर्मियों से समय पर संपर्क नहीं हो पाता।
अतः आपसे निवेदन है कि कोटगा गाँव में मोबाइल टावर लगवाने की कृपा करें। ताकि वहाँ मजबूत सिग्नल हो और गाँववासी डिजिटल इण्डिया मुहीम से भी शीघ्र जुड़ सकें।
हमें आशा है कि आप हमारी समस्या को गंभीरतापूर्वक लेंगे तथा गाँव को इस समस्या से जल्द ही निजात दिलाएंगे।
धन्यवाद!
दिनांक:
-निवेदक-
युवक मण्डल कोटगा
सेवा में
श्रीमान प्रबंध संचालक जी,
रिलायंस जियो मुख्यालय,
शिमला, हिमाचल प्रदेश ।
विषय: कोटगा गाँव में मोबाइल नेटवर्क (सिग्नल) की समस्या के संदर्भ में।
मान्यवर,
आपको अवगत कराना चाहता हूँ कि हमारे गाँव कोटगा, पंचायत- पौक्का, जिला-सिरमौर, हिमाचल प्रदेश में नेटवर्क (सिग्नल) की बहुत समस्या है। हमारे गाँव की जनसंख्या लगभग 800 व्यक्ति है। गाँव के लोग गाँव से दूर इधर-उधर सिग्नल की खोज में जाते हैं, फिर भी ठीक से सिग्नल नहीं मिल पाता। जिससे बच्चों को पढ़ाई की समस्या आती है तथा गाँव के लोग क्षेत्र एवं देश-विदेश से संबंधित सभी सूचनाओं से वंचित रहते है। गाँव से बाहर जो लोग व्यवसाय अथवा शिक्षा के लिए गए हुए हैं, उनका अपने परिवार वालों से संपर्क नहीं हो पाता। स्वास्थ्य संबंधित समस्या आने पर स्वास्थ्य कर्मियों से समय पर संपर्क नहीं हो पाता।
अतः आपसे निवेदन है कि कोटगा गाँव में मोबाइल टावर लगवाने की कृपा करें। ताकि वहाँ मजबूत सिग्नल हो और गाँववासी डिजिटल इण्डिया मुहीम से भी शीघ्र जुड़ सकें।
हमें आशा है कि आप हमारी समस्या को गंभीरतापूर्वक लेंगे तथा गाँव को इस समस्या से जल्द ही निजात दिलाएंगे।
धन्यवाद!
दिनांक:
-निवेदक-
युवक मण्डल कोटगा
Thursday, August 26, 2021
Afghanistan Conflict
Afghanistan Conflict-
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भागे।
अफगानिस्तान देश पर आतंकवादी संगठन तालिबान का कब्जा, जल्द ही वहाँ अपनी सरकार भी बनाएंगे।
कहाँ गया संयुक्त राष्ट्र संघ, कहाँ गये मानवों की सुरक्षा की बात करने वाले वो मानवाधिकार आयोग?
कहाँ गये इस्लामिक देश?
कहाँ गये स्वयं को इस्लाम के संरक्षक कहने वाले वो मुस्लिम आका?
कहाँ गया विश्व की महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका?
क्यों सभी अंतर्राष्ट्रीय संगठन और विश्व के अन्य देश मूक दर्शक बनकर अफगानिस्तान पर हो रहे तालिबान के अत्याचारों को निहारते रहे, क्यों किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया?
और भी बहुत से सवाल......
...............
अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से सैन्य वापसी के गलत फैसले ने तालिबान को अवसर प्रदान किया। जिसका भयावह परिणाम सबके समक्ष है। इसे अमेरिका की सोची समझी चाल कहना गलत नहीं होगा। अफगानिस्तान में उत्पन्न वर्तमान हालातों के लिए सबसे बड़ा दोषी अमेरिकी राष्ट्रपति जोसेफ रॉबिनेट बाइडेन है, जिसने सत्ता में आते ही अफगानिस्तान से पूर्ण रूप से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी का फैसला लिया। जब बाइडेन ने सैन्य वापसी का फैसला लिया तो अफगानिस्तान में अमेरिका के लगभग 2500 सैनिक उपस्थित थे, जिसे कम किया जा सकता था। किन्तु पूरी तरह से वहाँ से अपने सैनिकों को हटाना हरगिज मुनासिब नहीं था। अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के सैनिकों को दिया गया प्रशिक्षण भी खोखला निकला। तभी तो 3 लाख से अधिक सैनिकों वाली अफगान सेना ने 80 हजार तालिबानी आतंकियों के समक्ष घुटने टेक दिए। बहुत जगह तो अफगान सैनिकों ने तालिबान का सामना किए बिना ही समर्पण कर दिया।
हाँ यह बात एकदम सही है कि अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है, हम दूसरों के भरोसे नहीं बैठ सकते। जब अफगानिस्तान किसी के सहारे अभी अपने पैरों पर खड़े होने की ओर बढ़ ही रहा था, तभी सहारा देने वाले ने धोखा देकर अचानक से उसका साथ छोड़ दिया और वो धड़ाम से गिर पड़ा।
बाइडेन ने अपने सैन्य अधिकारियों और खुफिया एजेंसियों की राय को दरकिनार कर अफ़गानिस्तान के हालात को देखे बिना एकदम से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का निर्णय लिया। जो बहुत ही खतरनाक साबित हुआ। अधिकांश विशेषज्ञों ने अमेरिका को अपनी पूरी सेना को इस तरह एकदम हटाने को गलत निर्णय बतलाया है।
अमेरिका ने 2020 से तालिबान जैसे खतरनाक आतंकी संगठन को मान्यता देने की ओर कदम उठाया। इससे अमेरिका ने अपनी अफगानिस्तान की विदेश नीति को दरकिनार करते हुए तालिबान को बढ़ावा देना शुरू किया। अमेरिका ने फरवरी 2020 में अफगान सरकार को धोखा देते हुए तालिबान के साथ एक समझौते के तहत अफगानिस्तान सरकार पर लगभग 5000 तालिबानी आतंकी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया। रिहा होने के बाद इन कैदियों ने अफगानिस्तान में फिर से अपना आतंक फैलाना प्रारंभ कर दिया। अमेरिका के इस धोखे से अफगानिस्तान सरकार के साथ-साथ अफगान सेना के हौसले भी कमजोर पड़ने लगे। इसके अतिरिक्त अमेरिका ने अपनी विदेश नीति के अनुसार कार्य न करके केवल स्वहित को ऊपर रखा। उसने अफगानिस्तान सेना को न तो ठीक से प्रशिक्षण दिया और न ही उन्हें तालिबान से लड़ने के लिए उच्च स्तर के हथियार मुहैया कराए।
..........
अफगानी शरणार्थियों को भगाएं नहीं, अपितु अपनाएं- संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव एंटोनियो गुटेरस.....
अभी UNO का प्रमुख कार्य अफगानिस्तान में तालिबान के अत्याचार को रोकना और अफगानिस्तान को नर्क बनाने वाले तालिबान को सबक सिखाना है।
पर वो इस विषय पर कोई बात नहीं कर रहा। कोई औचित्य नहीं ऐसे संयुक्त राष्ट्र संघ का। संयुक्त राष्ट्र संघ कुछ देशों के हाथ की कठपुतली है, जो उनके इशारों पर कार्य करता है। जिसमें अमेरिका सबसे ऊपर है।
भारत के संबंध में देखा जाए तो अभी तक भारत के अफगानिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत रहे हैं। भारत का अफगानिस्तान में निर्माण कार्यों में भी महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा है। किन्तु अब तालिबान द्वारा सत्ता पर काबिज होने के पश्चात भारत के साथ कैसे संबंध होंगे, इस विषय में अभी कह पाना मुश्किल है। पर यह किसी भी तरह भारत के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान तालिबान के सहयोग से भारत को क्षति पहुँचाने का अवसर जरूर खोजेगा।
सभी देश आतंकवाद को समाप्त करने की बात करते हैं, भारत सहित सभी देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात करते हैं। अभी कहाँ गये सब?
जो सम्प्रति अफगानिस्तान के साथ हो रहा है, उसका शिकार भविष्य में कोई और देश भी हो सकता है। यदि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न की गई, तो उसे इसी प्रकार बढ़ावा मिलता रहेगा और संपूर्ण विश्व में आतंकवाद का विस्तार बढ़ता रहेगा।
........................................
Dr. MANOJ SHARMA
........................................
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी देश छोड़कर भागे।
अफगानिस्तान देश पर आतंकवादी संगठन तालिबान का कब्जा, जल्द ही वहाँ अपनी सरकार भी बनाएंगे।
कहाँ गया संयुक्त राष्ट्र संघ, कहाँ गये मानवों की सुरक्षा की बात करने वाले वो मानवाधिकार आयोग?
कहाँ गये इस्लामिक देश?
कहाँ गये स्वयं को इस्लाम के संरक्षक कहने वाले वो मुस्लिम आका?
कहाँ गया विश्व की महाशक्ति कहलाने वाला अमेरिका?
क्यों सभी अंतर्राष्ट्रीय संगठन और विश्व के अन्य देश मूक दर्शक बनकर अफगानिस्तान पर हो रहे तालिबान के अत्याचारों को निहारते रहे, क्यों किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया?
और भी बहुत से सवाल......
...............
अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान से सैन्य वापसी के गलत फैसले ने तालिबान को अवसर प्रदान किया। जिसका भयावह परिणाम सबके समक्ष है। इसे अमेरिका की सोची समझी चाल कहना गलत नहीं होगा। अफगानिस्तान में उत्पन्न वर्तमान हालातों के लिए सबसे बड़ा दोषी अमेरिकी राष्ट्रपति जोसेफ रॉबिनेट बाइडेन है, जिसने सत्ता में आते ही अफगानिस्तान से पूर्ण रूप से अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी का फैसला लिया। जब बाइडेन ने सैन्य वापसी का फैसला लिया तो अफगानिस्तान में अमेरिका के लगभग 2500 सैनिक उपस्थित थे, जिसे कम किया जा सकता था। किन्तु पूरी तरह से वहाँ से अपने सैनिकों को हटाना हरगिज मुनासिब नहीं था। अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान के सैनिकों को दिया गया प्रशिक्षण भी खोखला निकला। तभी तो 3 लाख से अधिक सैनिकों वाली अफगान सेना ने 80 हजार तालिबानी आतंकियों के समक्ष घुटने टेक दिए। बहुत जगह तो अफगान सैनिकों ने तालिबान का सामना किए बिना ही समर्पण कर दिया।
हाँ यह बात एकदम सही है कि अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ता है, हम दूसरों के भरोसे नहीं बैठ सकते। जब अफगानिस्तान किसी के सहारे अभी अपने पैरों पर खड़े होने की ओर बढ़ ही रहा था, तभी सहारा देने वाले ने धोखा देकर अचानक से उसका साथ छोड़ दिया और वो धड़ाम से गिर पड़ा।
बाइडेन ने अपने सैन्य अधिकारियों और खुफिया एजेंसियों की राय को दरकिनार कर अफ़गानिस्तान के हालात को देखे बिना एकदम से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का निर्णय लिया। जो बहुत ही खतरनाक साबित हुआ। अधिकांश विशेषज्ञों ने अमेरिका को अपनी पूरी सेना को इस तरह एकदम हटाने को गलत निर्णय बतलाया है।
अमेरिका ने 2020 से तालिबान जैसे खतरनाक आतंकी संगठन को मान्यता देने की ओर कदम उठाया। इससे अमेरिका ने अपनी अफगानिस्तान की विदेश नीति को दरकिनार करते हुए तालिबान को बढ़ावा देना शुरू किया। अमेरिका ने फरवरी 2020 में अफगान सरकार को धोखा देते हुए तालिबान के साथ एक समझौते के तहत अफगानिस्तान सरकार पर लगभग 5000 तालिबानी आतंकी कैदियों को रिहा करने का दबाव बनाया। रिहा होने के बाद इन कैदियों ने अफगानिस्तान में फिर से अपना आतंक फैलाना प्रारंभ कर दिया। अमेरिका के इस धोखे से अफगानिस्तान सरकार के साथ-साथ अफगान सेना के हौसले भी कमजोर पड़ने लगे। इसके अतिरिक्त अमेरिका ने अपनी विदेश नीति के अनुसार कार्य न करके केवल स्वहित को ऊपर रखा। उसने अफगानिस्तान सेना को न तो ठीक से प्रशिक्षण दिया और न ही उन्हें तालिबान से लड़ने के लिए उच्च स्तर के हथियार मुहैया कराए।
..........
अफगानी शरणार्थियों को भगाएं नहीं, अपितु अपनाएं- संयुक्त राष्ट्र संघ महासचिव एंटोनियो गुटेरस.....
अभी UNO का प्रमुख कार्य अफगानिस्तान में तालिबान के अत्याचार को रोकना और अफगानिस्तान को नर्क बनाने वाले तालिबान को सबक सिखाना है।
पर वो इस विषय पर कोई बात नहीं कर रहा। कोई औचित्य नहीं ऐसे संयुक्त राष्ट्र संघ का। संयुक्त राष्ट्र संघ कुछ देशों के हाथ की कठपुतली है, जो उनके इशारों पर कार्य करता है। जिसमें अमेरिका सबसे ऊपर है।
भारत के संबंध में देखा जाए तो अभी तक भारत के अफगानिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंध मजबूत रहे हैं। भारत का अफगानिस्तान में निर्माण कार्यों में भी महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा है। किन्तु अब तालिबान द्वारा सत्ता पर काबिज होने के पश्चात भारत के साथ कैसे संबंध होंगे, इस विषय में अभी कह पाना मुश्किल है। पर यह किसी भी तरह भारत के पक्ष में नहीं है। पाकिस्तान तालिबान के सहयोग से भारत को क्षति पहुँचाने का अवसर जरूर खोजेगा।
सभी देश आतंकवाद को समाप्त करने की बात करते हैं, भारत सहित सभी देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की बात करते हैं। अभी कहाँ गये सब?
जो सम्प्रति अफगानिस्तान के साथ हो रहा है, उसका शिकार भविष्य में कोई और देश भी हो सकता है। यदि आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई न की गई, तो उसे इसी प्रकार बढ़ावा मिलता रहेगा और संपूर्ण विश्व में आतंकवाद का विस्तार बढ़ता रहेगा।
........................................
Dr. MANOJ SHARMA
........................................
Subscribe to:
Posts (Atom)
Indian football history
क्या आप जानते हैं? (Indian football's History), Indian football Team won the gold medal in Asian Games 1962.... 1962 जकार्ता (इण्...
-
शिर्गुल/श्रीकुल महाराज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि- 🙏ॐ शिर्गुलाय नमः🙏 यह सुलतानों के शासन काल की 13वीं सदी की बात है, उन दिनों दिल्ली ...
-
Sanskrit- एकता में बल होता है। ऐक्यं बलं समाजस्य तदभावे स दुर्बल:। एकता समाज का बल होता है, एकताहीन समाज दुर्बलता को प्राप्त होता है। ऐक्यं...