किसान आंदोलन का राजनीतिकरण-
सरकार द्वारा लाए गए नये कृषि कानूनों के खिलाफ़ पिछले काफी दिनों से किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे हैं। अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करना हम सबका अधिकार है। किंतु गणतंत्र दिवस पर जो हुआ, उस घटना ने संपूर्ण विश्व में पूरे देश की छवि खराब की है। तय मार्ग को छोड़कर अलग मार्ग से जाकर राष्ट्रीय धरोहर तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शर्मनाक और निंदनीय है। पुलिस के लगभग 400 जवान इस हिंसा के शिकार हुए।
उसके बाद भी सरकार और पुलिस पर आरोप लगाना शर्मनाक है। इससे किसानों का अड़ियल रवैया सामने आता है।
सरकार आरंभ से ही कृषि कानूनों को लेकर किसानों की मांगों के सन्दर्भ में नरमी दिखा रही है। सरकार ने किसान नेताओं के साथ इसको लेकर अनेकों बैठकें की। सरकार ने कृषि कानूनों को डेढ़ वर्ष तक स्थगित करने का प्रस्ताव रखा, इसमें संशोधन करने के लिए कहा, बिल के प्रत्येक बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा के लिए कहा। पर किसान फिर भी अपनी बात पर अड़े रहे, उन्हें सभी क़ानूनों के स्थगन से कम कुछ भी मंजूर नहीं। उच्चतम न्यायालय ने इस बिल को अमल में लाने पर रोक लगाते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है, किंतु किसानों को न्याय की शीर्ष अदालत का यह फैसला भी रास नहीं आया। किसानों ने हर प्रस्ताव और पहल का बहिष्कार कर अपने अड़ियल रवैए का ही परिचय दिया है। जिसका परिणाम हमें गणतंत्र दिवस पर देखने को मिला।
किसी भी समस्या का हल तभी संभव है जब उस समस्या से जुड़े दोनों पक्ष झुके। जब एक पक्ष अनेक विकल्प रख रहा हो और दूसरा पक्ष एक कदम भी पीछे हटने के लिए तैयार न हो तो किसी भी समस्या का समाधान होना असंभव है।
कुछ राजनीतिक दल अभी तक तो अप्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे, किंतु गणतंत्र दिवस की घटना के बाद से अब बहुत से राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए खुलकर इस आंदोलन के समर्थन में आगे आ रहे हैं। जिस कारण किसान आंदोलन ने अब पूरी तरह से राजनीतिक रूप धारण कर लिया है।
डाॅ. मनोज शर्मा
Hello, I am Dr. Manoj Sharma. I love writing and reading. I always want to learn something new and aspire to do something different from others. I never like to copy anyone. I always try to invent my own.
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