Tuesday, February 2, 2021

Farmers Movement

गलत दिशा की ओर अग्रसर किसान आंदोलन-

        पिछले दो माह से चल रहे किसान आंदोलन पर अभी तक मेरी कलम खामोश थी। पर गणतंत्र दिवस पर हुए शर्मनाक घटनाक्रम ने मुझे लिखने पर मजबूर किया। किसी राजनीतिक पार्टी विशेष से जुड़े कट्टरपंथी कृपया ध्यान दें, मेरा लेख राजनीतिक परक न होकर यथार्थ पर आधारित है।
        कोई भी आंदोलन तब तक सही है, जब तक वो अपने उद्देश्य पर अग्रसर है। सितम्बर 1920 से फ़रवरी 1922 तक गाँधी जी के नेतृत्त्व में असहयोग आंदोलन चला। 4 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले के चौरा-चौरी नामक स्थान पर आंदोलन में शामिल लोगों ने उग्र होकर पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें लगभग 22 पुलिस कर्मियों की जान गई। इस घटना से गाँधी जी इतने व्यथित हुए कि उन्होंने इस आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लेते हुए कहा कि हिंसा को प्राप्त होने वाले इस आंदोलन को और हिंसक होने से बचाने के लिए मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूँ, यहाँ तक कि इसे रोकने के लिए मुझे मृत्यु भी स्वीकार है। 
       गाँधी जी ने शिखर पर पहुंचे अपने इस आंदोलन को इसलिए वापस नहीं लिया था कि यह पहले से कमज़ोर पड़ गया था,बल्कि इसलिए वापस लेने का निर्णय लिया था, क्योंकि अब यह अपनी दिशा से भटक चुका था।
      संप्रति चल रहे किसान आंदोलन में शामिल आंदोलनकर्ता किसानों में से 90% से अधिक को यही पता नहीं है कि नये कृषि कानून में क्या प्रावधान किए गए हैं। 
    उनसे पूछा गया कि आप लाल किले तक क्यों और कैसे पहुँच गये? इस पर उनका जवाब था कि हमारे नेता आगे थे, वो जहाँ जा रहे थे हम उनके पीछे चल रहे थे। उनसे पूछा गया कि आपने जो किया, सरकारी धरोहर को क्षति पहुंचायी और पुलिस पर प्रहार किया, क्या ये गलत नहीं है? इस पर भी ट्रैकर सवार किसानों का कहना था कि नहीं हमने कुछ गलत नहीं किया है, इतने दिन सब्र किया है , ये तो होना ही था अब, हमारे नेता जो भी कर रहे हैं, वो सही कर रहे हैं। 
      इसका अर्थ हुआ कि यह सब कार्य कुछ चंद किसान नेताओं के कारण हो रहा है। जो इसे राजनैतिक रूप प्रदान कर रहे हैं। अधिकांश किसानों को यथार्थ का ज्ञान ही नहीं है तथा आंदोलन में शामिल किसान पूरे देश के किसानों का केवल कुछ प्रतिशत मात्र है। इस आंदोलन में पूरे देश के किसान शामिल नहीं है। इस पर हम ये तो नहीं कह सकते कि बाकी सभी किसान अनपढ़ और गवार है। 
       कुछ लोगों का मानना है कि सरकार इस आंदोलन को गलत तरीके से समाप्त करना चाहती है। यदि ऐसा होता तो गणतंत्र दिवस पर जो शर्मनाक घटना आंदोलनकारियों ने की है, उसके आधार पर सरकार फोर्स लगाकर चंद घंटो में आंदोलन स्थल को खाली करवा सकती थी और अब तो सरकार को इसमें स्थानीय लोगों का साथ भी मिल रहा था। पर सरकार ने ऐसा न करके अब भी किसान नेताओं को बातचीत के लिए आमंत्रित किया और कहा कि हम अब भी पूर्व की भाँति ही आपसे वार्तालाप के लिए तैयार हैं। 
         चलो मान लिया इस बिल में कुछ कमियाँ है। इसके लिए सरकार इतने विकल्प रख रही है, संशोधन करने के लिए तैयार है, बिल पर खुली चर्चा के लिए तैयार है, इसे कुछ समय तक स्थगित करने के लिए कह रही है, लिखित में आश्वस्त करने के लिए भी तैयार है। फिर भी अपनी बात पर ही अड़े रहना और राष्ट्रीय पर्व पर लाल किले पर चढ़कर राष्ट्रीय धरोहर को नुकसान पहुँचा कर संपूर्ण विश्व में देश की छवि को खराब करना कहाँ तक सही है?
      लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता। यह सरकार और जनता दोनों के सहयोग से चलता है। ज्यादा सरकार झुक रही है, तो कुछ आंदोलनकारी को भी झुकना होगा, क्योंकि यह सरकार भी जनता द्वारा ही पूर्ण बहुमत से चुनी गई है। चंद आंदोलनकारियों के कारण पूरे देश के संदर्भ में लिए गए फैसले नहीं बदले जा सकते।
       इस प्रकार तो भविष्य में सरकार द्वारा निर्मित और संसद द्वारा पारित किसी भी कानून के खिलाफ 2-4 संगठन हमेशा खड़े होते रहेंगे। और यदि सरकार और संसद कुछ संगठनों के अनुसार कार्य करती रहेगी, तो देश की उस बहुसंख्यक शेष जनता के साथ अन्याय होगा, जिसने सरकार को बहुमत देकर सत्ता सौंपी है।

            -डॉ. मनोज शर्मा-

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