Monday, July 7, 2025

संस्कृत सूक्ति- Sanskrit

SANSKRIT Sukti - संस्कृत सूक्ति - 

विनाशकाले विपरीत बुद्धि:।
 जब मनुष्य का विनाश निकट आता है, तो उसकी बुद्धि उलटा ही सोचती है, बुद्धि कार्य करना बंद कर देती है।

अति सर्वत्र वर्जयेत्।
अतिरूपेण वै सीता अतिगर्वेण रावणः ।
अतिदानाद्  बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् ।।
अत्यधिक  सुन्दरता के कारण सीताहरण हुआ, अत्यंत घमंड के कारण रावण का अंत हुआ, अत्यधिक दान देने के कारण राजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा, अतः सर्वत्र अति को त्यागना चाहिए ।

प्रकाण्ड विद्वान रावण ने अपने अंतिम समय में लक्ष्मण को दी शिक्षा-
शुभस्य शीघ्रम्। 
शुभ/मंगल कार्य को शीघ्र कर लेना चाहिए, इसमें तनिक भी देर नहीं करनी चाहिए। अशुभ कार्य को जितना हो सके टाल देना चाहिए। 
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आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति |
अर्थात मुसीबत के समय मर्यादा का उल्लंगन करना कोई बुरी बात नहीं है |
|| रामायण।।

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संस्कृतम् Sanskrit

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