कर्ण के नाम-
कर्ण, सूर्यपुत्र, कौन्तेय, राधेय, सूतपुत्र, दानवीर, अंगराज।
कर्ण- सूर्य देव ने जन्म होने के साथ ही अपने पुत्र को यह नाम दिया था।
सूर्यपुत्र- सूर्य का पुत्र होने के कारण। सूर्य ने कुन्ती को पुत्र के रूप में कर्ण दिया था।
कुन्ती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने कुन्ती को वरदान के रूप में एक दिव्य मंत्र देते हुए कहा था कि इस मंत्र के जाप से तुम जिस भी देवता का ध्यान/आह्वान करोगी, तुम्हे उस देवता के अंश से उसी देवता के समान तेजस्वी और बलशाली पुत्र उत्पन्न होगा। कुन्ती ने मन्त्र का परीक्षण करने के लिए सूर्य देवता का ध्यान किया और सूर्य देव ने प्रकट होकर उसे कर्ण के रूप में पुत्र दिया। विवाह से पूर्व पुत्र प्राप्ति होने पर लोक-लाज के भय से कुन्ती ने कर्ण को नदी के जल में प्रवाहित कर दिया। यह बालक नदी में अधिरथ और राधा को प्राप्त हुआ, जिन्होंने इसका पालन-पोषण किया।
कौन्तेय- कुन्ती का पुत्र होने के कारण।
राधेय- पालन करने वाली माता राधा के कारण।
सूतपुत्र- सूत अर्थात रथ को चलाने वाला सारथी। कर्ण के पालनकर्ता पिता 'अधिरथ' सारथी थे, जो राधा के पति थे। अधिरथ (सूत)का पुत्र होने के कारण कर्ण को सूतपुत्र कहा गया।
दानवीर- दान मांगने पर कर्ण किसी को भी निराश नहीं करते थे। उनसे जो कुछ भी कोई मांगता था, वो सहर्ष दे देते थे। इसके लिए फिर चाहे उनके स्वयं के प्राण ही संकट में क्यों न पड़ जाय। इन्द्र द्वारा दान मांगने पर कर्ण ने अपने शरीर से कवच और कुण्डल काट कर दिये थे। इसी कारण कर्ण को दानवीर कहा जाता है।
अंगराज- अंग देश/प्रदेश का राजा होने के कारण। जब सूतपुत्र कहकर कर्ण का अपमान हो रहा था तो उस समय दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा घोषित किया था। दुर्योधन के इसी उपकार के कारण कर्ण दुर्योधन का मित्र बनकर आजीवन उसके प्राणों की रक्षा का प्रण लेता है।
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Dr. MANOJ SHARMA ......................................