सेवा में,
माननीय ऊर्जा मंत्री,
हिमाचल प्रदेश, सरकार
विषय- कोटगा काण्डो गाँव में पानी की समस्या के सन्दर्भ में।
मान्यवर,
गाँव-कोटगा काण्डो, पंचायत-पौक्का, जिला-सिरमौर में काफी समय से पानी की समस्या है। यहाँ "उठाऊ पेयजल योजना कोटगा काण्डो" काफी समय से बंद पड़ी हुई है। जिसका मुख्य कारण यहाँ पम्प चालक की स्थायी नियुक्ति का न होना है।
इसके संदर्भ में अनेक बार संबंधित विभाग को भी अवगत कराया गया है तथा मुख्यमंत्री सेवा संकल्प पर भी इस सन्दर्भ में अनेक बार शिकायत दर्ज करायी गई है, जिसकी शिकायत संख्या 289641 और 298718 है। किन्तु अभी तक भी समस्या का कोई समाधान नहीं हुआ है। जिस कारण गाँव में सभी लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जल जैसी मूलभूत सुविधा के अभाव में संपूर्ण गाँववासी अनेक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। गाँव में पशुओं के पीने के पानी की कमी होना, घर के निर्माण कार्यों इत्यादि में रूकावट आना, सिंचाई के अभाव में खेतों में लगी सब्जियों का नष्ट हो जाना तथा महिलाओं का घर से लगभग 3-4 किमी. दूर पानी के लिए जाना।
महोदय आपसे निवदेन है कि आप उठाऊ पेयजल योजना कोटगा काण्डो के लिए स्थायी पम्प चालक की नियुक्ति शीघ्रातिशीघ्र करवाएँ। जिससे संपूर्ण ग्रामवासियों को दीर्घकाल से बनी हुई इस समस्या से निजात मिल सके।
आशा है कि आप हमारी समस्या को गंभीरता से लेंगे और इस पर त्वरित कार्रवाई करेंगे।
धन्यवाद!
प्रार्थी
युवक मण्डल कोटगा
दिनांक- 01.02.2021
Hello, I am Dr. Manoj Sharma. I love writing and reading. I always want to learn something new and aspire to do something different from others. I never like to copy anyone. I always try to invent my own.
Sunday, January 31, 2021
Farmers Movement
किसान आंदोलन का राजनीतिकरण-
सरकार द्वारा लाए गए नये कृषि कानूनों के खिलाफ़ पिछले काफी दिनों से किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे हैं। अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करना हम सबका अधिकार है। किंतु गणतंत्र दिवस पर जो हुआ, उस घटना ने संपूर्ण विश्व में पूरे देश की छवि खराब की है। तय मार्ग को छोड़कर अलग मार्ग से जाकर राष्ट्रीय धरोहर तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शर्मनाक और निंदनीय है। पुलिस के लगभग 400 जवान इस हिंसा के शिकार हुए।
उसके बाद भी सरकार और पुलिस पर आरोप लगाना शर्मनाक है। इससे किसानों का अड़ियल रवैया सामने आता है।
सरकार आरंभ से ही कृषि कानूनों को लेकर किसानों की मांगों के सन्दर्भ में नरमी दिखा रही है। सरकार ने किसान नेताओं के साथ इसको लेकर अनेकों बैठकें की। सरकार ने कृषि कानूनों को डेढ़ वर्ष तक स्थगित करने का प्रस्ताव रखा, इसमें संशोधन करने के लिए कहा, बिल के प्रत्येक बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा के लिए कहा। पर किसान फिर भी अपनी बात पर अड़े रहे, उन्हें सभी क़ानूनों के स्थगन से कम कुछ भी मंजूर नहीं। उच्चतम न्यायालय ने इस बिल को अमल में लाने पर रोक लगाते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है, किंतु किसानों को न्याय की शीर्ष अदालत का यह फैसला भी रास नहीं आया। किसानों ने हर प्रस्ताव और पहल का बहिष्कार कर अपने अड़ियल रवैए का ही परिचय दिया है। जिसका परिणाम हमें गणतंत्र दिवस पर देखने को मिला।
किसी भी समस्या का हल तभी संभव है जब उस समस्या से जुड़े दोनों पक्ष झुके। जब एक पक्ष अनेक विकल्प रख रहा हो और दूसरा पक्ष एक कदम भी पीछे हटने के लिए तैयार न हो तो किसी भी समस्या का समाधान होना असंभव है।
कुछ राजनीतिक दल अभी तक तो अप्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे, किंतु गणतंत्र दिवस की घटना के बाद से अब बहुत से राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए खुलकर इस आंदोलन के समर्थन में आगे आ रहे हैं। जिस कारण किसान आंदोलन ने अब पूरी तरह से राजनीतिक रूप धारण कर लिया है।
डाॅ. मनोज शर्मा
सरकार द्वारा लाए गए नये कृषि कानूनों के खिलाफ़ पिछले काफी दिनों से किसान दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे हैं। अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करना हम सबका अधिकार है। किंतु गणतंत्र दिवस पर जो हुआ, उस घटना ने संपूर्ण विश्व में पूरे देश की छवि खराब की है। तय मार्ग को छोड़कर अलग मार्ग से जाकर राष्ट्रीय धरोहर तथा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना शर्मनाक और निंदनीय है। पुलिस के लगभग 400 जवान इस हिंसा के शिकार हुए।
उसके बाद भी सरकार और पुलिस पर आरोप लगाना शर्मनाक है। इससे किसानों का अड़ियल रवैया सामने आता है।
सरकार आरंभ से ही कृषि कानूनों को लेकर किसानों की मांगों के सन्दर्भ में नरमी दिखा रही है। सरकार ने किसान नेताओं के साथ इसको लेकर अनेकों बैठकें की। सरकार ने कृषि कानूनों को डेढ़ वर्ष तक स्थगित करने का प्रस्ताव रखा, इसमें संशोधन करने के लिए कहा, बिल के प्रत्येक बिन्दुओं पर विस्तृत चर्चा के लिए कहा। पर किसान फिर भी अपनी बात पर अड़े रहे, उन्हें सभी क़ानूनों के स्थगन से कम कुछ भी मंजूर नहीं। उच्चतम न्यायालय ने इस बिल को अमल में लाने पर रोक लगाते हुए इसकी समीक्षा के लिए एक समिति का गठन किया है, किंतु किसानों को न्याय की शीर्ष अदालत का यह फैसला भी रास नहीं आया। किसानों ने हर प्रस्ताव और पहल का बहिष्कार कर अपने अड़ियल रवैए का ही परिचय दिया है। जिसका परिणाम हमें गणतंत्र दिवस पर देखने को मिला।
किसी भी समस्या का हल तभी संभव है जब उस समस्या से जुड़े दोनों पक्ष झुके। जब एक पक्ष अनेक विकल्प रख रहा हो और दूसरा पक्ष एक कदम भी पीछे हटने के लिए तैयार न हो तो किसी भी समस्या का समाधान होना असंभव है।
कुछ राजनीतिक दल अभी तक तो अप्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे, किंतु गणतंत्र दिवस की घटना के बाद से अब बहुत से राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए खुलकर इस आंदोलन के समर्थन में आगे आ रहे हैं। जिस कारण किसान आंदोलन ने अब पूरी तरह से राजनीतिक रूप धारण कर लिया है।
डाॅ. मनोज शर्मा
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