लाॅकडाउन की अवधि में पहाड़ों का माहौल-
पहाड़ों के जो गाँव आज तक वीरान नज़र आते थे वहाँ अब रौनक दिखाई देने लगी है। जब गाँव में कोई सामूहिक पर्व होता है तभी लोग गाँव में एकत्रित होते थे, किंतु आजकल लाॅकडाउन के कारण शहरों से सभी लोग गाँव की ओर पलायन कर रहे हैं। गाँव के माहौल को देखकर लगता ही नहीं कि देश में लाॅकडाउन स्थापित है तथा ये गाँव भी देश के अन्दर ही आते हैं। यहाँ लाॅकडाउन का पालन कराने के लिए किसी भी प्रकार की व्यवस्था दृष्टिगोचर नहीं होती है। कहीं-कहीं सेनेटाइजर और मास्क का वितरण कर औपचारिकता मात्र की जा रही है। ग्रामीणों की संख्या के लिहाज से इसका वितरण बहुत कम हो रहा है, जिसका कोई लाभ नहीं है। क्योंकि जब तक प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक कोरोना के प्रसार का खतरा बना रहेगा। शहरों में जिस गति से कोरोना का प्रसार बढ़ रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि यह महामारी अब कभी भी गाँव में दस्तक दे सकती है। दूसरे राज्यों से मजदूरों और छात्रों का अपने घरों की ओर लौटने के कारण गाँव में कोरोना के संक्रमण का खतरा और अधिक बढ़ गया है। ये सभी गाँव में कोरोना वायरस के वाहक बन सकते हैं। यदि एक बार कोरोना ने गाँव में दस्तक दे दी तो यहाँ इसका प्रसार रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि गाँव के लोगों में अब तक भी कोरोना को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई दे रही हैं।
गाँव में जहाँ एक ओर सभी बच्चे सामूहिक खेलों में मशगूल हैं तो दूसरी ओर महिलाएँ एवं बुजुर्ग एक स्थान पर एकत्रित होकर पूर्ववत बातों में मग्न रहते हैं। ऐसा नहीं है कि गाँव के लोग इस विश्वव्यापी महामारी से अनभिज्ञ हैं, किंतु बिना दण्डनीति के किसी भी आदेश का पालन सहजता से करवाना मुश्किल होता है। स्थानीय प्रशासन को इसकी ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए। किंतु प्रशासन के जागने से पूर्व गाँव के लोगों का भी दायित्व है कि वे स्वयं ही कोरोना को लेकर सतर्क हो जाएँ। बाहरी राज्यों से गाँव में आये मजदूरों और छात्रों की सूचना स्थानीय प्रशासन को दें, जिससे समय पर उन सबको क्वारंटाइन किया जा सकें। स्थानीय लोगों को इन सभी से शारीरिक दूरी का पालन करना चाहिए तथा कोरोना के प्रसार में सहायक सभी तत्वों के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए। इससे गाँव में कोविड-19 का प्रवेश रोका जा सकता है।
आजकल पहाड़ों में अंधविश्वास का प्रसार भी हो रहा है, जिसमें कोयले एवं हल्दी का तिलक लगाने से कोरोना वायरस से मुक्ति की बात भी अत्यधिक प्रचलित हो रही है। लोगों को सम्प्रति किसी भी अफवाह एवं अंधविश्वास की ओर ध्यान न देकर सरकार के सभी आदेशों का सम्यक्तया पालन करना चाहिए। इसी में सभी लोगों की सुरक्षा है।
दुर्योधन की हठ के कारण 18 दिन में कुरुक्षेत्र की संपूर्ण भूमि रक्त से लाल हो गई थी और कौरवों का विनाश हो गया था। यदि लाॅकडाउन की इस अवधि में लोगों ने सावधानी नहीं बरती तो संपूर्ण भारतवर्ष कोविड-19 रूपी महामारी के महाप्रलय का साक्षी बनेगा। इस महामारी से बचाव का जो एकमात्र उपाय लाॅकडाउन है, सम्प्रति उसका पालन करना ही देश के प्रत्येक नागरिक का प्रमुख कर्तव्य है तथा इसी में सबका हित निहित है।
डॉ. मनोज शर्मा 'मनुज'
पहाड़ों के जो गाँव आज तक वीरान नज़र आते थे वहाँ अब रौनक दिखाई देने लगी है। जब गाँव में कोई सामूहिक पर्व होता है तभी लोग गाँव में एकत्रित होते थे, किंतु आजकल लाॅकडाउन के कारण शहरों से सभी लोग गाँव की ओर पलायन कर रहे हैं। गाँव के माहौल को देखकर लगता ही नहीं कि देश में लाॅकडाउन स्थापित है तथा ये गाँव भी देश के अन्दर ही आते हैं। यहाँ लाॅकडाउन का पालन कराने के लिए किसी भी प्रकार की व्यवस्था दृष्टिगोचर नहीं होती है। कहीं-कहीं सेनेटाइजर और मास्क का वितरण कर औपचारिकता मात्र की जा रही है। ग्रामीणों की संख्या के लिहाज से इसका वितरण बहुत कम हो रहा है, जिसका कोई लाभ नहीं है। क्योंकि जब तक प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक कोरोना के प्रसार का खतरा बना रहेगा। शहरों में जिस गति से कोरोना का प्रसार बढ़ रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि यह महामारी अब कभी भी गाँव में दस्तक दे सकती है। दूसरे राज्यों से मजदूरों और छात्रों का अपने घरों की ओर लौटने के कारण गाँव में कोरोना के संक्रमण का खतरा और अधिक बढ़ गया है। ये सभी गाँव में कोरोना वायरस के वाहक बन सकते हैं। यदि एक बार कोरोना ने गाँव में दस्तक दे दी तो यहाँ इसका प्रसार रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि गाँव के लोगों में अब तक भी कोरोना को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई दे रही हैं।
गाँव में जहाँ एक ओर सभी बच्चे सामूहिक खेलों में मशगूल हैं तो दूसरी ओर महिलाएँ एवं बुजुर्ग एक स्थान पर एकत्रित होकर पूर्ववत बातों में मग्न रहते हैं। ऐसा नहीं है कि गाँव के लोग इस विश्वव्यापी महामारी से अनभिज्ञ हैं, किंतु बिना दण्डनीति के किसी भी आदेश का पालन सहजता से करवाना मुश्किल होता है। स्थानीय प्रशासन को इसकी ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए। किंतु प्रशासन के जागने से पूर्व गाँव के लोगों का भी दायित्व है कि वे स्वयं ही कोरोना को लेकर सतर्क हो जाएँ। बाहरी राज्यों से गाँव में आये मजदूरों और छात्रों की सूचना स्थानीय प्रशासन को दें, जिससे समय पर उन सबको क्वारंटाइन किया जा सकें। स्थानीय लोगों को इन सभी से शारीरिक दूरी का पालन करना चाहिए तथा कोरोना के प्रसार में सहायक सभी तत्वों के प्रति सावधानी बरतनी चाहिए। इससे गाँव में कोविड-19 का प्रवेश रोका जा सकता है।
आजकल पहाड़ों में अंधविश्वास का प्रसार भी हो रहा है, जिसमें कोयले एवं हल्दी का तिलक लगाने से कोरोना वायरस से मुक्ति की बात भी अत्यधिक प्रचलित हो रही है। लोगों को सम्प्रति किसी भी अफवाह एवं अंधविश्वास की ओर ध्यान न देकर सरकार के सभी आदेशों का सम्यक्तया पालन करना चाहिए। इसी में सभी लोगों की सुरक्षा है।
दुर्योधन की हठ के कारण 18 दिन में कुरुक्षेत्र की संपूर्ण भूमि रक्त से लाल हो गई थी और कौरवों का विनाश हो गया था। यदि लाॅकडाउन की इस अवधि में लोगों ने सावधानी नहीं बरती तो संपूर्ण भारतवर्ष कोविड-19 रूपी महामारी के महाप्रलय का साक्षी बनेगा। इस महामारी से बचाव का जो एकमात्र उपाय लाॅकडाउन है, सम्प्रति उसका पालन करना ही देश के प्रत्येक नागरिक का प्रमुख कर्तव्य है तथा इसी में सबका हित निहित है।
डॉ. मनोज शर्मा 'मनुज'
very good sir
ReplyDeletebeautiful