Saturday, November 30, 2024

बूढ़ी दीवाली, दीपावली, Budi Diwali

सभी को बूढ़ी दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ💐💐

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बुलो आई गोयी बूढ़ी दीवाली ऐबे,

बेडोली, मुड़ा-शाकुली बणांदे सोबे।

आई गाई रे एबे बूढ़ी दीवाली।

आमारे खाणे गुलगुले-बेडोली।।

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💐बूढ़ी दीवाली💐

हमारी संस्कृति का एक पारंपरिक, महत्त्वपूर्ण और प्रसिद्ध त्योहार।

आज 19.11.2025 को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के गिरीपार क्षेत्र में बूढ़ी दीवाली का पवित्र पर्व मनाया जा रहा है। सिरमौर के आतिरिक्त कुल्लू जिले के निरमंड और आनी, शिमला जिले के चौपाल तथा उत्तराखंड राज्य के जौनसार बावर में भी बूढ़ी दीवाली का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व देश में मनाए जाने वाले दीपावली पर्व के एक माह बाद मनाया जाता है। इस पर्व में रात को गाँव के लोग मशाल जलाकर एक जगह एकत्र होते हैं और स्थानीय वाद्य यंत्रों के साथ पहाड़ी समूह नाटी एवं रासा नाटी लगाते हैं। कई स्थानों पर स्थानीय कलाकारों द्वारा लोगों के मनोरंजन हेतु सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किये जाते हैं, जिनमें लोकनृत्य, पारंपरिक हारूल इत्यादि आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहते हैं।

इस पर्व में सिरमौर के गिरीपार क्षेत्र में बहुत से स्थानीय स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं जिनमें बेडोली, गुलगुले, असकली इत्यादि प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त बूढ़ी दीवाली के लिए मुड़ा और शाकुली भी बनाए जाते हैं, जिसे लगभग सात-आठ माह तक खाया जाता है और घर पर आने वाले मेहमानों को भी खिलाया जाता है। ये मुड़ा और शाकुली ढिंटियों (विवाहित बेटियों) को ससुराल के लिए भी दिया जाता है। ढिंटिया इसके साथ मायके का स्नेह भी साथ लेकर जाती है।

दीवाली के ठीक एक माह बाद बूढ़ी दीवाली को मनाने का कारण- जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर एवं लंका के राजा रावण र विजय प्राप्ति के पश्चात अयोध्या लौटे थे, तब गिरीपार व अन्य क्षेत्रों में रबी की फसल की बुवाई (अक्टूबर-नवंबर) का कार्य चला हुआ था। यहाँ के लोग श्रीराम की लंका विजय के उत्सव को केवल एक-दो दिन नहीं अपितु अधिक दिनों तक मनाना चाहते थे। इसलिए जब फसल बुवाई का कार्य संपन्न हुआ, तभी लगभग एक माह बाद यहाँ के लोगों ने श्रीराम द्वारा लंका विजय के उपलक्ष्य में एक महोत्सव का आयोजन किया, जो लगभग दस से पन्द्रह दिन तक चलता रहा। उस समय से लेकर आजतक यह परंपरा कायम है और आज भी दीवाली के ठीक एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। हालांकि अब इस महोत्सव को मनाने के दिवस पहले से कम हो गये हैं, कहीं पर पाँच-छः दिन तो कहीं पर दो-तीन दिन तक बूढ़ी दीवाली के त्योहार का आयोजन होता है।

     बूढ़ी दीवाली का त्योहार आपसी सौहार्द, प्रेम, एकता और भाईचारे का पवित्र पर्व है। हमें अपनी इस परंपरा और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और इसे सुदृढ़ करने का प्रयास कर संजोए रखना चाहिए।

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Dr. MANOJ SHARMA "MANUJ"

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