Kotga- My Village ..... My Lineage/ Family Tree/ वंश वृक्ष
इस धरा पर सबको खुश कर पाना आसान नहीं।
दूसरों की खातिर जीकर स्वार्थ का त्याग आसान नहीं।
ये जीवन जो मिला है,सार्थक इसे कर तू हर हाल में,
बार-बार इस भारत भूमि पर जन्म मिलना आसान नहीं।
मैं डाॅ. मनोज शर्मा सेणैइक, गाँव-कोटगा, पंचायत-पोका, जिला-सिरमौर, हिमाचल प्रदेश, भारत। ज्ञात तथ्यों एवं साक्ष्य के आधार पर अपनी वंश परंपरा (वंशवृक्ष) का उल्लेख करने जा रहा हूँ। मैंने जिस वंश और परम्परा में जन्म लिया है, मुझे उस पर गर्व है।
अपनी पीढ़ी के विषय में हमें अवश्य जानकारी होनी चाहिए और उसे किसी भी साधन के माध्यम से सुरक्षित रखने का उपाय करना चाहिए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों के विषय में जानकारी प्राप्त हो सके। हमें अपने पूर्वजों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करना चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है और उनकी अच्छे कार्यों की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है। उन्हें अपने पूर्वजों पर नाज होता है और इससे उनके भीतर एक नयी ऊर्जा का संचार होता है। वे इस विषय में अपने मित्रों से बातें करके गौरवान्वित महसूस करते हैं।
वे भी चाहते हैं कि हम भी कोई ऐसा कार्य करें, जिससे हमारी अग्रिम पीढ़ी हमें याद करें और हमारे तथ्यों को सुरक्षित कर आगे परोसे।
तो चलिए अब मैं अपनी पीढ़ी के विषय में उल्लेख करना आरंभ करता हूँ।
जहाँ तक तथ्य ज्ञात है तदनुसार सर्वप्रथम भगता शर्मा जैसलमेर से कोटगा आये। जैसलमेर, राजस्थान में पाकिस्तान की सीमा से सटा हुआ जिला है। जब भगता शर्मा कोटगा आये, तब सरकार ने उन्हें नम्बरदार के पद पर काबिज किया। अंग्रेज़ी हुकुमत से ही नम्बरदार सरकार के राजस्व विभाग संबंधी कार्य करते आ रहे हैं। भगता शर्मा के नम्बरदार बनने के बाद उनके घर का नाम सेणैइक पड़ा। सेणैइक का अर्थ सयाना, जो पूरे गाँव का सयाना हो। जिनकी सहमति से पूरे गाँव के निर्णय लिये जाते थे। जैसे कोई फसल बीजना और काटना आदि सभी निर्णय नम्बरदार को पूछकर ही लिए जाते थे। इसलिए वर्तमान में भी अधिकांश गाँव में सेणैइक ही नम्बरदार है। इस समय सेणैइक के कोटगा में 5 घर (परिवार) है।
भगता शर्मा का पुत्र मानसिंह था। मानसिंह का पुत्र सिसराम था।
सिसराम, डोंटिया (जेरिया) और लोरिया तीन भाई थे। जेरिया को कान से कम सुनता था, इसलिए उनको सभी जेरिया या जायरा बोलते थे। जायरा अर्थात जिसे कान से कम सुनाई देता है।
इसी जेरिया के नाम पर ही "जेरैइक" नाम पड़ा। जिनके वर्तमान में 6 घर (परिवार) है।
लोरिया को बोलते थे कि एसके भी ल्होरे लागी रुये कोलोइ कोथी-कोलोइ कोथी। अर्थात लोरिया का अधिकतर समय इधर-उधर बेड़े में घुमने में व्यतीत होता था। इसलिए उनको सभी लोरिया बोलते थे। लोरिया के नाम पर "लरैइक" नाम पड़ा। इनके वर्तमान में 5 घर (परिवार) है।
मेरी पीढ़ी- भगता शर्मा-मानसिंह-सिसराम-हरिराम- रामानन्द-रामकिशन, सोमचंद- अनुज, डाॅ. मनोज, विपिन- परीक्षित शर्मा।
मानसिंह ने आगरो में जमीन खरीदी थी। जिसे बाद में उनके पुत्र सिसराम ने नघेता के बिजोऊ और रयाण को चांदी के 1800 सिक्कों में बेच दिया। इन 1800 सिक्कों को कट्टे में भरकर घर लाया और सिसराम ने उन सिक्कों को अपने पुत्र अर्थात मेरे प्रपितामह (परदादा) हरिराम के पास दिये और कहा कि इन्हें रतोरिया, सतौन के घर रखना है। सिक्कों को रतोरिया के घर केवल सुरक्षा के लिहाज से रखा गया था, इसका अन्य कोई विशेष मकसद या कारण नहीं था।
मानसिंह ने धमौण में 8 बीघा खेत खरीदे थे। जिसका कुछ भाग सिसराम ने मेवाणियों (टटियाणा) को बेचा और कुछ अपने पास ही रखा।
इसके अतिरिक्त मानसिंह ने सतौन से ऊपर नाव बाड़वा में भी जमीन खरीदी। मानसिंह की झिंपी नाम की एक पुत्री थी। उन्होंने झिंपी का विवाह कमरऊ के खलसेट परिवार में करवाया और नाव बाड़वा की जमीन अपनी पुत्री को दहेज के रूप में दे दी।
हमारी कुछ जमीन भीतरकुई में भी थी। जो मेरे प्रपितामह हरिराम ने कलसैक को बेच दी। किन्तु भीतरकुई में कुछ जमीन अब भी हमारे पास है।
मैं अपने प्रपितामह हरिराम के विषय में कुछ विशेष बातें बताना चाहता हूँ। उन्होंने हमें भी बचपन में काफी प्यार दिया। उनका जीवन किसी बादशाह से कम नहीं था। वो हमेशा एक राजा की तरह रहे। पूरे क्षेत्र में उनका रुतबा था। हर कोई उनके व्यक्तित्व से परिचित था। परिवार में भी उन्हें बहुत सम्मान प्राप्त था। उनकी कही बात को देववाणी समझकर शिरोधार्य किया जाता था। हर कोई उनके सेवा में लगा रहता था। पाँव धोने से पहले एक पंक्ति में उनके लिए लकड़ी की पटरियां रखी जाती थी, ताकि उनके पैर धोने के बाद बर्तन से निकलते ही जमीन से न लगकर सीधे उन पटरियों पर पड़े, जबतक वो चूल्हे के पास न पहुँच जाए। खाना खाते समय रोटी तवे से सीधा उनकी थाली में जाती थी। उनका खान-पान और रहन-सहन एकदम शाही था। वे वाकपटु एवं बुद्धिमान थे, जो उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देता था।
एक समय की बात है, जब भाट (ब्राह्मण) और डेटियों (ब्राह्मण से थोड़ा कमतर समुदाय) के बीच एक विषय पर विवाद हो गया था। भाट पक्ष के लोगों का कहना था कि हम डेटियों के साथ जिमना (ब्राह्मण भोज) नहीं करेंगे। ये बात डेटियों को ठीक नहीं लगी। डेटियों ने "बोहल धार" नामक गाँव में एक बहुत बड़ी महासभा का आयोजन किया। इस बैठक में भाट और डेटियों के अतिरिक्त दूर-दूर के खश (राजपूत) को भी आमंत्रित किया गया था। बहुत बड़े स्तर पर बैठक का आयोजन हुआ। बैठक में मेरे प्रपितामह नम्बरदार हरिराम भी शामिल हुए। खश के अधिकांश लोगों ने डेटियों का पक्ष लेते हुए सभी भाट समुदाय के लोगों से कहा कि आप सभी को इनके साथ जिमना (ब्राह्मण भोज) करना होगा। भाट समुदाय के बहुत से लोग सहमत हो गये, क्योंकि उनकी आजीविका खश लोगों पर निर्भर थी। उनके घरों में पूजा पाठ कर ही उनकी आजीविका चलती थी। यदि वो खश समुदाय के इस निर्णय के विरुद्ध जाते तो उनकी आजीविका छिन सकती थी। कुछ भाट लोगों ने इस निर्णय को मानने से इंकार किया, तो उन्हें डरा-धमका कर इस निर्णय को मानने के लिए बाध्य किया गया। इस तरह डेटियों के पक्ष में लिए गये इस निर्णय को सभी भाट समुदाय के लोगों ने दुःखी मन से स्वीकार कर लिया, सिवाय मेरे प्रपितामह नम्बरदार हरिराम के। उन्होंने इस महाबैठक द्वारा लिये गये निर्णय को अस्वीकार कर दिया। सभी लोग ये देखकर आश्चर्यचकित हो गये। सबने उन्हें दबाने और डराने की कोशिश की। पर वो न तो किसी से दबे और न ही किसी से डरे। वो अपने फैसले पर अडिग रहे और निडर होकर कहा कि मैं किसी से नहीं डरता और न ही मुझे किसी की जरूरत है। मैं आज इस महासभा में प्रण लेता हूँ कि आजीवन किसी के घर जिमना (ब्राह्मण भोज) नहीं करूंगा। उन्होंने आमरण अपने इस प्रण का पालन किया। उन्हें कुछ बोलने और उनको रोकने का किसी में साहस नहीं था। वो उस सभा का त्याग करके उठे और अपने घोड़े पर सवार होकर चल पड़े। नम्बरदार हरिराम जी की चारों ओर इतनी जमीन थी कि
लगभग सभी राजपुत समुदाय के पशु भी इनके ही चरागाहों में चरने जाते थे। वो कभी भी किसी से न तो डरे और न ही किसी के दबाव में आए।
हरिराम के दो बेटे हुये। ज्येष्ठ रामानन्द और कनिष्ठ पुत्र सीताराम शर्मा। पहले मैं अपने छोटे दादा जी सीताराम जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालना चाहुँगा, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। किसी ने सही ही कहा है कि अच्छे लोगों को ईश्वर अपने पास जल्दी बुला लेता है। अप्रैल 2002 में लगभग 53 वर्ष की आयु में वे पंचतत्व में विलीन हो गये।
मैं अपने पूरे परिवार और संबंधियों में सबसे अधिक आदरणीय एवं सम्माननीय इन्हें ही मानता था। अपने आज तक के संपूर्ण जीवन में जिनके व्यक्तित्व से मैं सर्वाधिक प्रभावित हुआ, वो मेरे छोटे दादा जी सीताराम ही है। मैं आज भी इन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा आदर्श मानता हूँ। वे छुट्टियों में जब भी गाँव आते थे तो खेतों के कार्य में जुट जाते थे। उनका गाँव में सबके साथ उठना-बैठना था और उनके अन्दर सबके प्रति आदर और सम्मान का भाव विद्यमान था। वे बड़े ही कर्मठ और कर्त्तव्य परायण थे। वे अपने अंतिम समय में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सतौन में डीपीई के पद पर कार्यरत थे। दुर्भाग्य से उन्हें एक ऐसी बिमारी ने अपना शिकार बना लिया था, जिसका इलाज आज भी आसान नहीं है। उन्हें इस बात का ज्ञान हो चुका था कि वो अब इस पृथिवीलोक पर कुछ ही दिनों के मेहमान है। इसके बावजूद भी उन्होेंने अपनी गहन पीड़ा को सहन करते हुये अंतिम समय तक अपने दायित्व का सम्यक्तया निर्वहन किया। मुझे ध्यान है, मैं भी तब उसी स्कूल में छठी कक्षा में पड़ता था और दादी जी मुझे बोलती थी कि अपने दादा जी के साथ ही जाना स्कूल। ताकि उनकी तबीयत खराब हो तो उनका ध्यान रहे। एक-दो बार मैं उनके साथ ही स्कूल गया। उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि बेटा तुम चले जाया करो, मैं खुद पहुँच जाया करूंगा। जब तक वो पूरी तरह से बिस्तर पर नहीं पड़ गये, तब तक वो स्कूल जाते रहे। स्कूल जाकर वो वहाँ बैठकर आराम नहीं करते थे। वे शारीरिक विभाग में शिक्षक थे, तो वो तब भी बच्चों को व्यायाम कराते थे और खेल खिलाते थे। सभी उनके जज्बे और जोश को देखकर हैरान थे। स्कूल के बच्चें उनको कितना मानते थे, ये तो उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ बच्चों का हुजूम ही बयां करता है। मैंने अपने अब तक के जीवन में अपने छोटे दादा जी जैसा महान व्यक्तित्व वाला इंसान नहीं देखा है और शायद आगे भी नहीं ही देख पाऊँ। वास्तव में वो मेरे लिए सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
अब मैं अपने बड़े दादा जी रामानन्द शर्मा नम्बरदार जी के विषय में बतलाना चाहुँगा।
लगभग 85 वर्ष की आयु में 19.09.2022 को दादा जी इस मायावी जगत से मुक्त होकर पंचतत्व में विलीन हो गये। यह एक शाश्वत सत्य है, जिसे सभी को दुःखी मन से स्वीकार करना पड़ता है। दादा जी अपने अंतिम समय तक केवल कुछ माह को छोड़कर एकदम स्वस्थ और तंदुरुस्त थे। अपने सभी कार्य स्वयं ही कर लेते थे, इसके साथ ही मेरे बड़े भाई के बच्चों को भी गोद में खिलाते हुये उनके साथ मस्ती करते रहते थे। इनका संध्या का एक नियम ऐसा था, जिस पर ये हमेशा अडिग रहते थे। मैंने दादा जी को बचपन से ही देखा था, ये नित्य हर हाल में दो बार सुबह-शाम संध्या वंदन करते थे। चाहे इनका स्वास्थ्य कितना ही खराब हो, किन्तु प्रतिदिन दो बार ईश्वर वंदना जरूर करते थे। मैं जब भी घर जाता था तो दादा जी वाले कमरे में ही सोता था। जब बिजली चली जाती थी तब भी मैंने दादा जी को टोर्च जलाकर मन्त्र पढ़ते हुये देखा था।
इनमें एक हुनर ये था कि कोई भी सरकारी कार्य कराना इनके बायें हाथ का खेल था। इनका बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों के साथ उठना-बैठना था। पहले हमारे सभी सरकारी कागजात भी दादा जी ही बनवाते थे। जिन कागजात को बनाने में लोगों को महीनों लग जाते थे, दादा जी दो-चार दिन में ही बनवा लेते थे। पूरे गाँव में अपनी और दादी जी की पेंशन भी सबसे पहले लगवाई।
कुछ समय पहले तक की बात करूँ, ये बहुत ही वाचाल(अधिक बोलने वाले) थे। इनका स्वभाव ऐसा था कि रास्ते में कोई मिल जाए, घर पर कोई मेहमान आ जाए, तो विना बात किये नहीं रह पाते थे। जब एक बार बोलना शुरू कर देते थे तो घण्टों तक बाते करते रहते थे। अर्थात बहुत अधिक बात करने वाले इंसान थे।
अब मैं इनके जीवन के अंतिम काल पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ। इनके जीवन के अंतिम 5 वर्षों में इनके व्यवहार एवं व्यक्तित्त्व में अचानक से चामत्कारिक परिवर्तन आया, जिसे देखकर सभी आश्चर्यचकित थे। इन्होंने जो करके दिखाया, वो वृद्धावस्था का सबसे अच्छा गुण और सबसे मुश्किल कार्य है। यदि इस अवस्था में किसी ने ये मुश्किल कार्य कर लिया तो बुढ़ापे का जीवन सहज और सुखमय बन जाता है। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि यदि मैं वृद्धावस्था के काल तक पहुँचा, तो मुझे मेरे दादा जी के समान संयम और शान्ति प्रदान करना। इतना अधिक बोलने वाला व्यक्ति अचानक से शान्त हो गया था। किसी से कोई बातचीत नहीं करते थे। यदि कोई सामने से कुछ बोलेगा, तो सिर्फ उसका जवाब देते थे, उससे अधिक और कुछ नहीं बोलते थे। हर प्रकार की मोह-माया से मुक्त हो चुके थे और किसी भी वस्तु से कोई मतलब नहीं रहा था। ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्होंने अपनी सभी इन्द्रियों पर नियन्त्रण पा लिया हो। जब दादा जी अंतिम कुछ माह तक बिस्तर पर आ गये थे और उठ नहीं पाते थे, तब भी इन्होंने किसी को परेशान नहीं किया। जबकि ऐसे हालात में आदमी बहुत परेशान हो जाता है और चिड़चिड़ापन आ जाता है। स्वभाव में अलग तरह का परिवर्तन आ जाता है। इन्हें दर्द हो, चाहे कितनी ही तकलीफ क्यों न हो, पर कभी किसी को अपने लिए परेशान नहीं किया।
अपने वास्तविक स्वभाव के ठीक विपरीत व्यवहार को धारण करना उतना ही कठिन है, जितना जल की धारा का अपनी विपरीत दिशा में बहना। वास्तव में मैं अपने दादा जी के वृद्धावस्था के जीवन से अत्यधिक प्रभावित हुआ हूँ और अपने वृद्धावस्था के जीवनकाल के लिए दादा जी के आदर्शों को ही अपनाना चाहुँगा। ईश्वर से कामना है कि मुझे इन आदर्शों को ग्रहण करने की इच्छा-शक्ति प्रदान करें।
अंत में मैं अपनी इन पंक्तियों के साथ लेखनी को विराम देना चाहुँगा-
आसमाँ सी चमक सहज ही नहीं मिलती।
अरमानों की मुस्कान अधरों पर यूँ ही नहीं खिलती।
जीवन के कई हसीन पलों का बलिदान देना पड़ता है।
तब जाकर अंबर-सा कद नसीब होता है।
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Dr. MANOJ SHARMA "MANUJ"
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Hello, I am Dr. Manoj Sharma. I love writing and reading. I always want to learn something new and aspire to do something different from others. I never like to copy anyone. I always try to invent my own.
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