वर्तमान सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है शिक्षा का गिरता हुआ स्तर तथा बढ़ती हुई बेरोजगारी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात से ही शिक्षा में सुधार के लिए समय-समय पर कई प्रयास किए गए। जिसमें डॉ. एस. राधाकृष्णनन् आयोग (1948-49) से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे प्रयास शामिल है। किन्तु इन प्रयासों के पश्चात भी शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जो कि एक गहन विचारणीय विषय है। इसके समाधान हेतु हमें परंपरागत गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति की ओर लौटना चाहिए।
अनुपयोगी हो रही आधुनिक शिक्षा प्रणाली में परंपरागत गुरुकुल शिक्षा पद्धति का कुछ आधुनिकता के साथ समावेश कर इसे उपयोगी बनाया जा सकता है। जिससे आज की युवा पीढ़ी आत्मनिर्भर होकर सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर सकती हैं तथा इससे बेरोजगारी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र ज्ञान भी दिया जाता था, जिससे बालक का सर्वांगीण विकास होता था। शास्त्र ज्ञान में जहाँ एक ओर अतीत, भूगर्भशास्त्र, चिकित्सा, कला, संगीत, धर्म, न्याय, राजनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी तो वहीं दूसरी ओर सभी शस्त्रों का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। उस समय का शस्त्र प्रशिक्षण तात्कालिक सामाजिक परिवेश एवं आवश्यकताओं के अनुसार दिया जाता था। सभी सरकारी स्कूलों में आजकल इस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिसकी वर्तमान में प्रासंगिकता हो। जैसे- मल्लयुद्ध (कुश्ती), तीरंदाजी, नीशानेबाजी, तैराकी, जुडो-कराटे आदि।
शस्त्रों के प्रशिक्षण से प्रत्येक नागरिक आत्मरक्षा करने में सक्षम होगा, व्यक्ति क्रीड़ा क्षेत्र में स्वप्रतिभा के बल पर सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकेगा, तथा आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए एक सैनिक के रूप में भी अपना योगदान दे सकता है, जिसके लिए अभी अलग से प्रशिक्षण दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में इस प्रकार की व्यवस्था स्थापित करने से सरकार अभिभावकों को सरकारी स्कूली शिक्षा की ओर आकर्षित करने में अवश्य सफल होगी तथा इससे सरकारी स्कूलों में कम होती छात्रों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी। इस प्रकार के प्रयास से वर्तमान में सरकार की प्रमुख समस्याओं में से एक सरकारी स्कूलों में छात्रों की निरंतर घटती संख्या का समाधान होगा।
प्रारंभिक स्तर पर छात्रों की रुचि तथा योग्यता की पहचान कर ही शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। इससे उनका स्वाभाविक एवं सर्वांगीण विकास संभव होगा।
यथा गुरु द्रोणाचार्य ने अपने गुरुकुल में सर्वप्रथम सभी शिष्यों की योग्यता की पहचान कर अपना शिक्षण आरंभ किया था। यही कारण है कि अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण था तो भीम और दुर्योधन गदा में तथा युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण था। गुरु अपने शिष्यों को किसी एक विद्या में पारंगत कर अन्य शिक्षा भी देते थे। तभी तो अर्जुन एक श्रेष्ठ धनुर्धारी होने के साथ- साथ गदा, तलवार, भाला आदि चलाने में भी समर्थ था। इस प्रकार शिष्यों का सर्वांगीण विकास होता था। जिसके प्रसिद्ध दृष्टांत के रूप में गुरु वशिष्ठ के शिष्य राम तथा गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य अर्जुन है जो शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण थे। ये दोनों ज्ञानी होने के साथ अनेकों प्रकार के शस्त्र चलाने में भी समर्थ थे। इन दोनों ने अनेकों बार शत्रुओं से अपने राज्य की रक्षा कर वीरता का परिचय दिया। इनकी ख्याति संपूर्ण आर्यावर्त में व्याप्त थी।
यदि आधुनिक शिक्षा प्रणाली को उपयोगी बनाना है तो गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का अनुसरण अत्यावश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु उपाय सुझाए जाने चाहिए। क्योंकि गुरु अपने शिष्य को वही दे सकता है जो उसके पास है। इससे संभवतः छात्रों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उनकी आत्मनिर्भरता भी सुनिश्चित होगी।
शिक्षण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों के उत्साहवर्धन हेतु उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय/राज्य स्तर पर दिये जाने वाले "उत्कृष्ट अध्यापक पुरस्कार" चयन हेतु निम्न मानक तय किये जाने चाहिए-
*इसके लिए समय-समय पर प्रत्येक स्कूल का निरीक्षण किया जाना चाहिए।
*प्रत्येक अध्यापक के विषय के परीक्षा परिणाम को देखा जाना चाहिए।
*अध्यापक की पढ़ाने की शैली एवं शिक्षण पद्धति को देखा जाना चाहिए।
*छात्रों के प्रति अध्यापक का समर्पण भाव देखा जाना चाहिए।
*अध्यापक से संबंधित एक फीडबैक फाॅर्म छात्रों द्वारा भरवाना चाहिए।
*स्कूल में अध्यापक की उपस्थिति की प्रतिशतता को देखा जाना चाहिए। etc.
-ये सभी डाटा एकत्रित करने के लिए सरकार द्वारा शिक्षा विभाग के अन्तर्गत अलग से एक विभाग खोला जाना चाहिए, जो निष्पक्ष रूप से यह कार्य कर सके। पुरस्कार के लिए अध्यापकों को स्वयं आवेदन करने को नहीं कहा जाना चाहिए।
तभी इस पुरस्कार के लिए सही में उत्कृष्ट अध्यापक का चयन किया जा सकेगा।
Dr. MANOJ SHARMA
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