Monday, July 7, 2025

संस्कृत श्लोक , Sanskrit Shalok

संस्कृत Sanskrit  - श्लोक 
अति सर्वत्र वर्जयेत्। -
अति रूपेण वै सीता चातिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्।।

अत्यधिक सुन्दरता के कारण सीता हरण हुआ।
अत्यंत घमंड के कारण रावण का अंत हुआ।
अत्यधिक दान देने के कारण राजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा।
अतः सर्वत्र अति को त्यागना चाहिए।.
अति कभी भी अच्छी नहीं होती फिर वह किसी भी कारण से हो।


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