ओ३म् अन्नपते अन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः |
प्र प्र दातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ||
शब्दार्थ :- हे {अन्नपते } अन्न के पति भगवन् ! {नः} हमे {अनमीवस्य }कीट आदि रहित{शुष्मिणः} बलकारक {अन्नस्य } अन्न के भण्डार{ देहि } दीजिये {प्रदातारं }अन्न का खूब दान देने वाले को {प्रतारिष } दु:खो से पार लगाईये{ नः} हमारे {द्विपदे चतुष्पदे} दोपायो और चौपायो को { ऊर्जं } बल {धेहि } दीजिये |
No comments:
Post a Comment