Monday, July 7, 2025

संस्कृत श्लोक , Sanskrit Shalok

संस्कृत Sanskrit  - श्लोक 
अति सर्वत्र वर्जयेत्। -
अति रूपेण वै सीता चातिगर्वेण रावणः।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्।।

अत्यधिक सुन्दरता के कारण सीता हरण हुआ।
अत्यंत घमंड के कारण रावण का अंत हुआ।
अत्यधिक दान देने के कारण राजा बाली को बंधन में बंधना पड़ा।
अतः सर्वत्र अति को त्यागना चाहिए।.
अति कभी भी अच्छी नहीं होती फिर वह किसी भी कारण से हो।


वर्तमान शिक्षा प्रणाली

वर्तमान शिक्षा प्रणाली- (Modern Education system)

         वर्तमान सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है शिक्षा का गिरता हुआ स्तर तथा बढ़ती हुई बेरोजगारी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात से ही शिक्षा में सुधार के लिए समय-समय पर कई प्रयास किए गए। जिसमें डॉ. एस. राधाकृष्णनन् आयोग (1948-49) से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे प्रयास शामिल है। किन्तु इन प्रयासों के पश्चात भी शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है, जो कि एक गहन विचारणीय विषय है। इसके समाधान हेतु हमें परंपरागत गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति की ओर लौटना चाहिए।       
       अनुपयोगी हो रही आधुनिक शिक्षा प्रणाली में  परंपरागत गुरुकुल शिक्षा पद्धति का कुछ आधुनिकता के साथ समावेश कर इसे उपयोगी बनाया जा सकता है। जिससे आज की युवा पीढ़ी आत्मनिर्भर होकर सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर सकती हैं तथा इससे बेरोजगारी को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
        गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शास्त्र ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र ज्ञान भी दिया जाता था, जिससे बालक का सर्वांगीण विकास होता था। शास्त्र ज्ञान में जहाँ एक ओर  अतीत, भूगर्भशास्त्र, चिकित्सा, कला, संगीत, धर्म, न्याय, राजनीति आदि की शिक्षा दी जाती थी तो वहीं दूसरी ओर सभी शस्त्रों का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। उस समय का शस्त्र प्रशिक्षण तात्कालिक सामाजिक परिवेश एवं आवश्यकताओं के अनुसार दिया जाता था। सभी सरकारी स्कूलों में आजकल इस प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए, जिसकी वर्तमान में प्रासंगिकता हो। जैसे- मल्लयुद्ध (कुश्ती), तीरंदाजी, नीशानेबाजी, तैराकी, जुडो-कराटे आदि।
शस्त्रों के प्रशिक्षण से प्रत्येक नागरिक आत्मरक्षा करने में सक्षम होगा, व्यक्ति क्रीड़ा क्षेत्र में स्वप्रतिभा के बल पर सुनहरे भविष्य का निर्माण कर सकेगा, तथा आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए एक सैनिक के रूप में भी अपना योगदान दे सकता है, जिसके लिए अभी अलग से प्रशिक्षण दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में इस प्रकार की व्यवस्था स्थापित करने से सरकार अभिभावकों को सरकारी स्कूली शिक्षा की ओर आकर्षित करने में अवश्य सफल होगी तथा इससे सरकारी स्कूलों में कम होती छात्रों की संख्या में भी बढ़ोतरी होगी। इस प्रकार के प्रयास से वर्तमान में सरकार की प्रमुख समस्याओं में से एक सरकारी स्कूलों में छात्रों की निरंतर घटती संख्या का समाधान होगा।
प्रारंभिक स्तर पर छात्रों की रुचि तथा योग्यता की पहचान कर ही शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए। इससे उनका स्वाभाविक एवं सर्वांगीण विकास संभव होगा।      
        यथा गुरु द्रोणाचार्य ने अपने गुरुकुल में सर्वप्रथम सभी शिष्यों की योग्यता की पहचान कर अपना शिक्षण आरंभ किया  था। यही कारण है कि अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण था तो भीम और दुर्योधन गदा में तथा युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण था। गुरु अपने शिष्यों को किसी एक विद्या में पारंगत कर अन्य शिक्षा भी देते थे। तभी तो अर्जुन एक श्रेष्ठ धनुर्धारी होने के साथ- साथ गदा, तलवार, भाला आदि चलाने में भी समर्थ था। इस प्रकार शिष्यों का सर्वांगीण विकास होता था। जिसके प्रसिद्ध दृष्टांत के रूप में गुरु वशिष्ठ के शिष्य राम तथा गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य अर्जुन है जो शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण थे। ये दोनों ज्ञानी होने के साथ अनेकों प्रकार के शस्त्र चलाने में भी समर्थ थे। इन दोनों ने अनेकों बार शत्रुओं से अपने राज्य की रक्षा कर वीरता का परिचय दिया। इनकी ख्याति संपूर्ण आर्यावर्त में व्याप्त थी।     
         यदि आधुनिक शिक्षा प्रणाली को उपयोगी बनाना है तो गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति का अनुसरण अत्यावश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम शिक्षकों के प्रशिक्षण हेतु उपाय सुझाए जाने चाहिए। क्योंकि गुरु अपने शिष्य को वही दे सकता है जो उसके पास है। इससे संभवतः छात्रों के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उनकी आत्मनिर्भरता भी सुनिश्चित होगी।
शिक्षण में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों के उत्साहवर्धन हेतु उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय/राज्य स्तर पर दिये जाने वाले "उत्कृष्ट अध्यापक पुरस्कार" चयन हेतु निम्न मानक तय किये जाने चाहिए-

*इसके लिए समय-समय पर प्रत्येक स्कूल का निरीक्षण किया जाना चाहिए।

*प्रत्येक अध्यापक के विषय के परीक्षा परिणाम को देखा जाना चाहिए।

*अध्यापक की पढ़ाने की शैली एवं शिक्षण पद्धति को देखा जाना चाहिए।

*छात्रों के प्रति अध्यापक का समर्पण भाव देखा जाना चाहिए।

*अध्यापक से संबंधित एक फीडबैक फाॅर्म छात्रों द्वारा भरवाना चाहिए।

*स्कूल में अध्यापक की उपस्थिति की प्रतिशतता को देखा जाना चाहिए। etc.

-ये सभी डाटा एकत्रित करने के लिए सरकार द्वारा शिक्षा विभाग के अन्तर्गत अलग से एक विभाग खोला जाना चाहिए, जो निष्पक्ष रूप से यह कार्य कर सके। पुरस्कार के लिए अध्यापकों को स्वयं आवेदन करने को नहीं कहा जाना चाहिए।
तभी इस पुरस्कार के लिए सही में उत्कृष्ट अध्यापक का चयन किया जा सकेगा।

     Dr.  MANOJ SHARMA 
                          

पर्यावरण दिवस, Environment Day

"विश्व पर्यावरण दिवस" 2019

इस बार की तपन से सभी वाकिफ हैं।
हाल ही में विश्व में सर्वाधिक तापमान भारत के चूरू (राजस्थान) में (50.3) दर्ज किया गया।
यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में इस पृथ्वी पर जीवन अत्यंत दुष्कर हो जाएगा।
इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कम से कम एक वृक्ष प्रतिवर्ष अवश्य लगाएँ तथा उसकी देखभाल भी अवश्य करें।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि जल का दुरुपयोग बिलकुल न करें। जल की बर्बादी को रोके। जल ही जीवन है। जल है तो ही पेड़-पौधों तथा सभी जीव-जन्तुओं का जीवन सुरक्षित हैं। पर्यावरण को संतुलित करना मानव के अधीन है। वह किसी भी प्राकृतिक संसाधन का अनावश्यक उपयोग न करें तथा प्राकृतिक संसाधनों को हानि न पहुँचाएँ। किन्तु यह तभी संभव है जब वह स्वार्थ की पूर्ति से बाहर निकलकर परोपकार का चिंतन करें, भावी पीढ़ी के जीवन का चिंतन करें। हम सभी का एक छोटा सा प्रयास बहुत सी जिंदगियों को सुरक्षित कर सकता है।
इसलिए इस "पर्यावरण दिवस" पर पर्यावरण को बचाने के लिए हम सब अपने स्तर पर सहयोग करने का संकल्प लें।
                    @Dr.MANOJ SHARMA 


महाभारत, भीष्म पितामह, Mahabharat

महाभारत, Mahabharat 

भीष्म पितामह-

भीष्म पितामह कुरू वंश एवं हस्तिनापुर नरेश शांतनु तथा उनकी प्रथम पत्नी माँ गंगा के पुत्र थे।
इनका नाम देवव्रत था। शांतनु ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में देवव्रत को हस्तिनापुर के युवराज पद पर नियुक्त किया था।
      शांतनु अपनी प्रेमिका/प्रियसी सत्यवती के वियोग की पीड़ा से अत्यधिक दुःखी था। पिता शांतनु की इस पीड़ा को दूर करने के लिए देवव्रत ने हस्तिनापुर के राज सिंहासन का त्याग कर आजीवन ब्रह्मचर्य धारण करने एवं सदैव हस्तिनापुर का दास बनकर राज्य की रक्षा करने की भीष्म (भयंकर) प्रतिज्ञा ली। इसी भीष्म प्रतिज्ञा के कारण पिता शांतनु ने देवव्रत को भीष्म नाम दिया।
     पिता के लिए किये गये इस महान त्याग के कारण पिता शांतनु ने भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया।

पितामह- पाण्डु एवं धृतराष्ट्र के पुत्रों के पितामह (दादा)होने के कारण पितामह कहलाए।
गंगापुत्र- गंगा के पुत्र होने के कारण।

भीष्म पितामह ज्ञानी तथा शूरवीर योद्धा थे। 23 दिन तक चले द्वंद्व युद्ध में भीष्म के गुरु परशुराम भी भीष्म को पराजित नहीं कर पाये थे।
@Dr.MANOJ SHARMA 

माँ, माता, जननी, Mother

माँ .....माता , जननी, Mother 

न मातुः परदैवतम् ॥

माँ से बढकर कोई देव नहीं है ।

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥

 पुत्र कुपुत्र होता है लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती ।

गुरुणामेव सर्वेषां माता गुरुतरा स्मृता ॥

सब गुरु में माता को सर्वश्रेष्ठ गुरु माना गया है ।

मातृ देवो भवः।
अर्थात, माता देवताओं से भी बढ़कर होती है।

आपदामापन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥

Hindi Translation:
जब विपत्तियां आने को होती हैं, तो हितकारी भी उनमें कारण बन जाता है ।
बछड़े को बांधने मे माँ की जांघ ही खम्भे का काम करती है ।
English Translation:
When calamities befall, even a wellwisher becomes a cause of them.
It is the leg of the mother that serves as the pillar for tying the calf.

 Source – Hitopadesha 1.30

मातृत्व दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

जननीभ्यः नमः!

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥
अर्थात:
माता के समान न कोई छाया है, न कोई आश्रय और न ही कोई सुरक्षा है। माता के समान संपूर्ण विश्व में कोई जीवनदाता नहीं है।
There is no shade like a mother, no resort-like a mother, no security like a mother. No other ever giving fountain of life.

 Source – Skanda Purana Mo. Ch. 6.103-104

Thursday, February 27, 2025

My Family Tree/Lineage/वंशवृक्ष.,. Dr. MANOJ SHARMA

Kotga- My Village ..... My Lineage/ Family Tree/ वंश वृक्ष
इस धरा पर सबको खुश कर पाना आसान नहीं।
दूसरों की खातिर जीकर स्वार्थ का त्याग आसान नहीं।
ये जीवन जो मिला है,सार्थक इसे कर तू हर हाल में,
बार-बार इस भारत भूमि पर जन्म मिलना आसान नहीं।  

         मैं डाॅ. मनोज शर्मा सेणैइक, गाँव-कोटगा, पंचायत-पोका, जिला-सिरमौर, हिमाचल प्रदेश, भारत। ज्ञात तथ्यों एवं साक्ष्य के आधार पर अपनी वंश परंपरा (वंशवृक्ष) का उल्लेख करने जा रहा हूँ। मैंने जिस वंश और परम्परा में जन्म लिया है, मुझे उस पर गर्व है।
      अपनी पीढ़ी के विषय में हमें अवश्य जानकारी होनी चाहिए और उसे किसी भी साधन के माध्यम से सुरक्षित रखने का उपाय करना चाहिए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों के विषय में जानकारी प्राप्त हो सके। हमें अपने पूर्वजों के अच्छे कार्यों का उल्लेख करना चाहिए। इससे आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है और उनकी अच्छे कार्यों की ओर प्रवृत्ति बढ़ती है। उन्हें अपने पूर्वजों पर नाज होता है और इससे उनके भीतर एक नयी ऊर्जा का संचार होता है। वे इस विषय में अपने मित्रों से बातें करके गौरवान्वित महसूस करते हैं।
वे भी चाहते हैं कि हम भी कोई ऐसा कार्य करें, जिससे हमारी अग्रिम पीढ़ी हमें याद करें और हमारे तथ्यों को सुरक्षित कर आगे परोसे।
     तो चलिए अब मैं अपनी पीढ़ी के विषय में उल्लेख करना आरंभ करता हूँ।
     जहाँ तक तथ्य ज्ञात है तदनुसार सर्वप्रथम भगता शर्मा जैसलमेर से कोटगा आये। जैसलमेर, राजस्थान में पाकिस्तान की सीमा से सटा हुआ जिला है। जब भगता शर्मा कोटगा आये, तब सरकार ने उन्हें नम्बरदार के पद पर काबिज किया। अंग्रेज़ी हुकुमत से ही नम्बरदार सरकार के राजस्व विभाग संबंधी कार्य करते आ रहे हैं। भगता शर्मा के नम्बरदार बनने के बाद उनके घर का नाम सेणैइक पड़ा। सेणैइक का अर्थ सयाना, जो पूरे गाँव का सयाना हो। जिनकी सहमति से पूरे गाँव के निर्णय लिये जाते थे। जैसे कोई फसल बीजना और काटना आदि सभी निर्णय नम्बरदार को पूछकर ही लिए जाते थे। इसलिए वर्तमान में भी अधिकांश गाँव में सेणैइक ही नम्बरदार है। इस समय सेणैइक के कोटगा में 5 घर (परिवार) है।
भगता शर्मा का पुत्र मानसिंह था। मानसिंह का पुत्र सिसराम था।
       सिसराम, डोंटिया (जेरिया) और लोरिया तीन भाई थे। जेरिया को कान से कम सुनता था, इसलिए उनको सभी जेरिया या जायरा बोलते थे। जायरा अर्थात जिसे कान से कम सुनाई देता है।
इसी जेरिया के नाम पर ही "जेरैइक" नाम पड़ा। जिनके वर्तमान में 6 घर (परिवार) है।
   लोरिया को बोलते थे कि एसके भी ल्होरे लागी रुये कोलोइ कोथी-कोलोइ कोथी। अर्थात लोरिया का अधिकतर समय इधर-उधर बेड़े में घुमने में व्यतीत होता था। इसलिए उनको सभी लोरिया बोलते थे। लोरिया के नाम पर "लरैइक" नाम पड़ा। इनके वर्तमान में 5 घर (परिवार) है।

मेरी पीढ़ी- भगता शर्मा-मानसिंह-सिसराम-हरिराम- रामानन्द-रामकिशन, सोमचंद- अनुज, डाॅ. मनोज, विपिन- परीक्षित शर्मा।

मानसिंह ने आगरो में जमीन खरीदी थी। जिसे बाद में उनके पुत्र सिसराम ने नघेता के बिजोऊ और रयाण को चांदी के 1800 सिक्कों में बेच दिया। इन 1800 सिक्कों को कट्टे में भरकर घर लाया और सिसराम ने उन सिक्कों को अपने पुत्र अर्थात मेरे प्रपितामह (परदादा) हरिराम के पास दिये और कहा कि इन्हें रतोरिया, सतौन के घर रखना है। सिक्कों को रतोरिया के घर केवल सुरक्षा के लिहाज से रखा गया था, इसका अन्य कोई विशेष मकसद या कारण नहीं था।
        मानसिंह ने धमौण में 8 बीघा खेत खरीदे थे। जिसका कुछ भाग सिसराम ने मेवाणियों (टटियाणा) को बेचा और कुछ अपने पास ही रखा।
    इसके अतिरिक्त मानसिंह ने सतौन से ऊपर नाव बाड़वा में भी जमीन खरीदी। मानसिंह की झिंपी नाम की एक पुत्री थी। उन्होंने झिंपी का विवाह कमरऊ के खलसेट परिवार में करवाया और नाव बाड़वा की जमीन अपनी पुत्री को दहेज के रूप में दे दी।
    हमारी कुछ जमीन भीतरकुई में भी थी। जो मेरे प्रपितामह हरिराम ने कलसैक को बेच दी। किन्तु भीतरकुई में कुछ जमीन अब भी हमारे पास है।
         मैं अपने प्रपितामह हरिराम के विषय में कुछ विशेष बातें बताना चाहता हूँ। उन्होंने हमें भी बचपन में काफी प्यार दिया। उनका जीवन किसी बादशाह से कम नहीं था। वो हमेशा एक राजा की तरह रहे। पूरे क्षेत्र में उनका रुतबा था। हर कोई उनके व्यक्तित्व से परिचित था। परिवार में भी उन्हें बहुत सम्मान प्राप्त था। उनकी कही बात को देववाणी समझकर शिरोधार्य किया जाता था। हर कोई उनके सेवा में लगा रहता था। पाँव धोने से पहले एक पंक्ति में उनके लिए लकड़ी की पटरियां रखी जाती थी, ताकि उनके पैर धोने के बाद बर्तन से निकलते ही जमीन से न लगकर सीधे उन पटरियों पर पड़े, जबतक वो चूल्हे के पास न पहुँच जाए। खाना खाते समय रोटी तवे से सीधा उनकी थाली में जाती थी। उनका खान-पान और रहन-सहन एकदम शाही था। वे वाकपटु एवं बुद्धिमान थे, जो उनके व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देता था।
        एक समय की बात है, जब भाट (ब्राह्मण) और डेटियों (ब्राह्मण से थोड़ा कमतर समुदाय) के बीच एक विषय पर विवाद हो गया था। भाट पक्ष के लोगों का कहना था कि हम डेटियों के साथ जिमना (ब्राह्मण भोज) नहीं करेंगे। ये बात डेटियों को ठीक नहीं लगी। डेटियों ने "बोहल धार" नामक गाँव में एक बहुत बड़ी महासभा का आयोजन किया। इस बैठक में भाट और डेटियों के अतिरिक्त दूर-दूर के खश (राजपूत) को भी आमंत्रित किया गया था। बहुत बड़े स्तर पर बैठक का आयोजन हुआ। बैठक में मेरे प्रपितामह नम्बरदार हरिराम भी शामिल हुए। खश के अधिकांश लोगों ने डेटियों का पक्ष लेते हुए सभी भाट समुदाय के लोगों से कहा कि आप सभी को इनके साथ जिमना (ब्राह्मण भोज) करना होगा। भाट समुदाय के बहुत से लोग सहमत हो गये, क्योंकि उनकी आजीविका खश लोगों पर निर्भर थी। उनके घरों में पूजा पाठ कर ही उनकी आजीविका चलती थी। यदि वो खश समुदाय के इस निर्णय के विरुद्ध जाते तो उनकी आजीविका छिन सकती थी। कुछ भाट लोगों ने इस निर्णय को मानने से इंकार किया, तो उन्हें डरा-धमका कर इस निर्णय को मानने के लिए बाध्य किया गया। इस तरह डेटियों के पक्ष में लिए गये इस निर्णय को सभी भाट समुदाय के लोगों ने दुःखी मन से स्वीकार कर लिया, सिवाय मेरे प्रपितामह नम्बरदार हरिराम के। उन्होंने इस महाबैठक द्वारा लिये गये निर्णय को अस्वीकार कर दिया। सभी लोग ये देखकर आश्चर्यचकित हो गये। सबने उन्हें दबाने और डराने की कोशिश की। पर वो न तो किसी से दबे और न ही किसी से डरे। वो अपने फैसले पर अडिग रहे और निडर होकर कहा कि मैं किसी से नहीं डरता और न ही मुझे किसी की जरूरत है। मैं आज इस महासभा में प्रण लेता हूँ कि आजीवन किसी के घर जिमना (ब्राह्मण भोज) नहीं करूंगा। उन्होंने आमरण अपने इस प्रण का पालन किया। उन्हें कुछ बोलने और उनको रोकने का किसी में साहस नहीं था। वो उस सभा का त्याग करके उठे और अपने घोड़े पर सवार होकर चल पड़े। नम्बरदार हरिराम जी की चारों ओर इतनी जमीन थी कि
लगभग सभी राजपुत समुदाय के पशु भी इनके ही चरागाहों में चरने जाते थे। वो कभी भी किसी से न तो डरे और न ही किसी के दबाव में आए।

         हरिराम के दो बेटे हुये। ज्येष्ठ रामानन्द और कनिष्ठ पुत्र सीताराम शर्मा। पहले मैं अपने छोटे दादा जी सीताराम जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालना चाहुँगा, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। किसी ने सही ही कहा है कि अच्छे लोगों को ईश्वर अपने पास जल्दी बुला लेता है। अप्रैल 2002 में लगभग 53 वर्ष की आयु में वे पंचतत्व में विलीन हो गये।
         मैं अपने पूरे परिवार और संबंधियों में सबसे अधिक आदरणीय एवं सम्माननीय इन्हें ही मानता था। अपने आज तक के संपूर्ण जीवन में जिनके व्यक्तित्व से मैं सर्वाधिक प्रभावित हुआ, वो मेरे छोटे दादा जी सीताराम ही है। मैं आज भी इन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा आदर्श मानता हूँ। वे छुट्टियों में जब भी गाँव आते थे तो खेतों के कार्य में जुट जाते थे। उनका गाँव में सबके साथ उठना-बैठना था और उनके अन्दर सबके प्रति आदर और सम्मान का भाव विद्यमान था। वे बड़े ही कर्मठ और कर्त्तव्य परायण थे। वे अपने अंतिम समय में राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय सतौन में डीपीई के पद पर कार्यरत थे। दुर्भाग्य से उन्हें एक ऐसी बिमारी ने अपना शिकार बना लिया था, जिसका इलाज आज भी आसान नहीं है। उन्हें इस बात का ज्ञान हो चुका था कि वो अब इस पृथिवीलोक पर कुछ ही दिनों के मेहमान है। इसके बावजूद भी उन्होेंने अपनी गहन पीड़ा को सहन करते हुये अंतिम समय तक अपने दायित्व का सम्यक्तया निर्वहन किया। मुझे ध्यान है, मैं भी तब उसी स्कूल में छठी कक्षा में पड़ता था और दादी जी मुझे बोलती थी कि अपने दादा जी के साथ ही जाना स्कूल। ताकि उनकी तबीयत खराब हो तो उनका ध्यान रहे। एक-दो बार मैं उनके साथ ही स्कूल गया। उसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि बेटा तुम चले जाया करो, मैं खुद पहुँच जाया करूंगा। जब तक वो पूरी तरह से बिस्तर पर नहीं पड़ गये, तब तक वो स्कूल जाते रहे। स्कूल जाकर वो वहाँ बैठकर आराम नहीं करते थे। वे शारीरिक विभाग में शिक्षक थे, तो वो तब भी बच्चों को व्यायाम कराते थे और खेल खिलाते थे। सभी उनके जज्बे और जोश को देखकर हैरान थे। स्कूल के बच्चें उनको कितना मानते थे, ये तो उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुआ बच्चों का हुजूम ही बयां करता है। मैंने अपने अब तक के जीवन में अपने छोटे दादा जी जैसा महान व्यक्तित्व वाला इंसान नहीं देखा है और शायद आगे भी नहीं ही देख पाऊँ। वास्तव में वो मेरे लिए सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
        अब मैं अपने बड़े दादा जी रामानन्द शर्मा नम्बरदार जी के विषय में बतलाना चाहुँगा।
लगभग 85 वर्ष की आयु में 19.09.2022 को दादा जी इस मायावी जगत से मुक्त होकर पंचतत्व में विलीन हो गये। यह एक शाश्वत सत्य है, जिसे सभी को दुःखी मन से स्वीकार करना पड़ता है। दादा जी अपने अंतिम समय तक केवल कुछ माह को छोड़कर एकदम स्वस्थ और तंदुरुस्त थे। अपने सभी कार्य स्वयं ही कर लेते थे, इसके साथ ही मेरे बड़े भाई के बच्चों को भी गोद में खिलाते हुये उनके साथ मस्ती करते रहते थे। इनका संध्या का एक नियम ऐसा था, जिस पर ये हमेशा अडिग रहते थे। मैंने दादा जी को बचपन से ही देखा था, ये नित्य हर हाल में दो बार सुबह-शाम संध्या वंदन करते थे। चाहे इनका स्वास्थ्य कितना ही खराब हो, किन्तु प्रतिदिन दो बार ईश्वर वंदना जरूर करते थे। मैं जब भी घर जाता था तो दादा जी वाले कमरे में ही सोता था। जब बिजली चली जाती थी तब भी मैंने दादा जी को टोर्च जलाकर मन्त्र पढ़ते हुये देखा था।
        इनमें एक हुनर ये था कि कोई भी सरकारी कार्य कराना इनके बायें हाथ का खेल था। इनका बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों के साथ उठना-बैठना था। पहले हमारे सभी सरकारी कागजात भी दादा जी ही बनवाते थे। जिन कागजात को बनाने में लोगों को महीनों लग जाते थे, दादा जी दो-चार दिन में ही बनवा लेते थे। पूरे गाँव में अपनी और दादी जी की पेंशन भी सबसे पहले लगवाई।
          कुछ समय पहले तक की बात करूँ, ये बहुत ही वाचाल(अधिक बोलने वाले) थे। इनका स्वभाव ऐसा था कि रास्ते में कोई मिल जाए, घर पर कोई मेहमान आ जाए, तो विना बात किये नहीं रह पाते थे। जब एक बार बोलना शुरू कर देते थे तो घण्टों तक बाते करते रहते थे। अर्थात बहुत अधिक बात करने वाले इंसान थे।
         अब मैं इनके जीवन के अंतिम काल पर प्रकाश डालने जा रहा हूँ। इनके जीवन के अंतिम 5 वर्षों में इनके व्यवहार एवं व्यक्तित्त्व में अचानक से चामत्कारिक परिवर्तन आया, जिसे देखकर सभी आश्चर्यचकित थे। इन्होंने जो करके दिखाया, वो वृद्धावस्था का सबसे अच्छा गुण और सबसे मुश्किल कार्य है। यदि इस अवस्था में किसी ने ये मुश्किल कार्य कर लिया तो बुढ़ापे का जीवन सहज और सुखमय बन जाता है। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूँ कि यदि मैं वृद्धावस्था के काल तक पहुँचा, तो मुझे मेरे दादा जी के समान संयम और शान्ति प्रदान करना। इतना अधिक बोलने वाला व्यक्ति अचानक से शान्त हो गया था। किसी से कोई बातचीत नहीं करते थे। यदि कोई सामने से कुछ बोलेगा, तो सिर्फ उसका जवाब देते थे, उससे अधिक और कुछ नहीं बोलते थे। हर प्रकार की मोह-माया से मुक्त हो चुके थे और किसी भी वस्तु से कोई मतलब नहीं रहा था। ऐसा प्रतीत होता था, मानो उन्होंने अपनी सभी इन्द्रियों पर नियन्त्रण पा लिया हो। जब दादा जी अंतिम कुछ माह तक बिस्तर पर आ गये थे और उठ नहीं पाते थे, तब भी इन्होंने किसी को परेशान नहीं किया। जबकि ऐसे हालात में आदमी बहुत परेशान हो जाता है और चिड़चिड़ापन आ जाता है। स्वभाव में अलग तरह का परिवर्तन आ जाता है। इन्हें दर्द हो, चाहे कितनी ही तकलीफ क्यों न हो, पर कभी किसी को अपने लिए परेशान नहीं किया।
       अपने वास्तविक स्वभाव के ठीक विपरीत व्यवहार को धारण करना उतना ही कठिन है, जितना जल की धारा का अपनी विपरीत दिशा में बहना। वास्तव में मैं अपने दादा जी के वृद्धावस्था के जीवन से अत्यधिक प्रभावित हुआ हूँ और अपने वृद्धावस्था के जीवनकाल के लिए दादा जी के आदर्शों को ही अपनाना चाहुँगा। ईश्वर से कामना है कि मुझे इन आदर्शों को ग्रहण करने की इच्छा-शक्ति प्रदान करें।

अंत में मैं अपनी इन पंक्तियों के साथ लेखनी को विराम देना चाहुँगा-
आसमाँ सी चमक सहज ही नहीं मिलती।
अरमानों की मुस्कान अधरों पर यूँ ही नहीं खिलती।
जीवन के कई हसीन पलों का बलिदान देना पड़ता है।
तब जाकर अंबर-सा कद नसीब होता है।
......................................................
Dr. MANOJ SHARMA "MANUJ"
......................................................

Saturday, November 30, 2024

बूढ़ी दीवाली, दीपावली, Budi Diwali

सभी को बूढ़ी दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ💐💐

.........................................

बुलो आई गोयी बूढ़ी दीवाली ऐबे,

बेडोली, मुड़ा-शाकुली बणांदे सोबे।

आई गाई रे एबे बूढ़ी दीवाली।

आमारे खाणे गुलगुले-बेडोली।।

.........................................

💐बूढ़ी दीवाली💐

हमारी संस्कृति का एक पारंपरिक, महत्त्वपूर्ण और प्रसिद्ध त्योहार।

आज 19.11.2025 को हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के गिरीपार क्षेत्र में बूढ़ी दीवाली का पवित्र पर्व मनाया जा रहा है। सिरमौर के आतिरिक्त कुल्लू जिले के निरमंड और आनी, शिमला जिले के चौपाल तथा उत्तराखंड राज्य के जौनसार बावर में भी बूढ़ी दीवाली का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व देश में मनाए जाने वाले दीपावली पर्व के एक माह बाद मनाया जाता है। इस पर्व में रात को गाँव के लोग मशाल जलाकर एक जगह एकत्र होते हैं और स्थानीय वाद्य यंत्रों के साथ पहाड़ी समूह नाटी एवं रासा नाटी लगाते हैं। कई स्थानों पर स्थानीय कलाकारों द्वारा लोगों के मनोरंजन हेतु सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किये जाते हैं, जिनमें लोकनृत्य, पारंपरिक हारूल इत्यादि आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहते हैं।

इस पर्व में सिरमौर के गिरीपार क्षेत्र में बहुत से स्थानीय स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं जिनमें बेडोली, गुलगुले, असकली इत्यादि प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त बूढ़ी दीवाली के लिए मुड़ा और शाकुली भी बनाए जाते हैं, जिसे लगभग सात-आठ माह तक खाया जाता है और घर पर आने वाले मेहमानों को भी खिलाया जाता है। ये मुड़ा और शाकुली ढिंटियों (विवाहित बेटियों) को ससुराल के लिए भी दिया जाता है। ढिंटिया इसके साथ मायके का स्नेह भी साथ लेकर जाती है।

दीवाली के ठीक एक माह बाद बूढ़ी दीवाली को मनाने का कारण- जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण कर एवं लंका के राजा रावण र विजय प्राप्ति के पश्चात अयोध्या लौटे थे, तब गिरीपार व अन्य क्षेत्रों में रबी की फसल की बुवाई (अक्टूबर-नवंबर) का कार्य चला हुआ था। यहाँ के लोग श्रीराम की लंका विजय के उत्सव को केवल एक-दो दिन नहीं अपितु अधिक दिनों तक मनाना चाहते थे। इसलिए जब फसल बुवाई का कार्य संपन्न हुआ, तभी लगभग एक माह बाद यहाँ के लोगों ने श्रीराम द्वारा लंका विजय के उपलक्ष्य में एक महोत्सव का आयोजन किया, जो लगभग दस से पन्द्रह दिन तक चलता रहा। उस समय से लेकर आजतक यह परंपरा कायम है और आज भी दीवाली के ठीक एक माह बाद बूढ़ी दीवाली मनाई जाती है। हालांकि अब इस महोत्सव को मनाने के दिवस पहले से कम हो गये हैं, कहीं पर पाँच-छः दिन तो कहीं पर दो-तीन दिन तक बूढ़ी दीवाली के त्योहार का आयोजन होता है।

     बूढ़ी दीवाली का त्योहार आपसी सौहार्द, प्रेम, एकता और भाईचारे का पवित्र पर्व है। हमें अपनी इस परंपरा और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और इसे सुदृढ़ करने का प्रयास कर संजोए रखना चाहिए।

..................................................

Dr. MANOJ SHARMA "MANUJ"

.....................................................

Indian football history

क्या आप जानते हैं? (Indian football's History), Indian football Team won the gold medal in Asian Games 1962....        1962 जकार्ता (इण्...